हिन्दी की विश्वयात्रा को गति देने का संकल्प
न्यूयार्क, 16 जुलाई (एजेंसी)। हिंदी की विश्वयात्रा को गति देने के संकल्प और इस आशय के दस सूत्री घोषणापत्र को जारी किए जाने के साथ ही आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन आज यहां सम्पन्न हो गया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के विशेष प्रतिनिधि डा. कर्ण सिंह ने हिंदी के 31 विशष्टि विद्वानों और हिंदीकर्मियों को सम्मानित किया।
घोषणापत्र में कहा गया है कि भारत सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषा बनाने के मुद्दे पर आने वाले कुछ महीनों में कोई औपचारिक पहल कर सकती है। हालांकि 1975 में नागपुर में हुए पहले सम्मेलन में ही हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषा बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ था। परंतु विगत 32 वर्षों में इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई।
सम्मेलन के माध्यम से भारत सरकार से आग्रह किया गया है कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का बहुमत जुटाने के लिए सरकार अभियान चलाए और इस दिशा में हरसंभव प्रयास किए जाएं ताकि हिंदी जल्द से जल्द संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषा बन सके। विदेशों में हिंदी और देवनागरी लिपि को लोकप्रिय बनाने के मकसद से हिंदी शिक्षण के लिए मानद पाठयक्रम बनाने की मांग भी की गई। तीन दिवसीय विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन पर आज वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे ने दस सूत्री घोषणापत्र जारी करते हुए हिंदी में ज्ञान, विज्ञान, प्रौघोगिकी, तकनीकी विशेषज्ञता पर सरल और उपयोगी हिंदी पुस्तक लेखन को प्रोत्साहन देने पर जोर दिया। इसके अलावा करीब छह महीने पहले मारिशस में स्थापित विश्व हिंदी सचिवालय के क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित करने पर भी जोर दिया गया।
सम्मेलन के दौरान विश्व र से आए हिंदी के प्रतििष्ठत हस्ताक्षरों ने हिंदी को विश्वमंच पर लोकप्रिय बनाने को लेकर विभिन्न पहलुओं पर विचार मंथन किया। सम्मेलन द्वारा जारी घोषणापत्र में अन्य बिंदु हैं : विदेशों में हिंदी का अध्यापन करने वाले विश्वविघालयों का डाटा बेस और अध्यापकों की सूची तैयार करना। विश्व के सभी हिंदीभाषियों एवं प्रवासी भारतीयों से आग्रह किया गया है कि वह हिंदी के प्रचार प्रसार में योगदान करें।
वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविघालय में विदेशी हिंदी विद्वानों के लिए शोध वृत्ति देने की भी मांग की गई।
हिन्दी विद्वान सम्मानित
न्यूयार्क में रविवार को समाप्त हुए तीन दिवसीय आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी के 40 विद्वानों को सम्मानित किया गया। केवल 31 विद्वान ही सम्मेलन में पहुंचे। इनमें से भारतीय विद्वानों की संख्या 17 थी। इनमें माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविघालय के उपकुलपति अच्युतानंद मिश्र और पूर्व सांसद मोहन धारिया भी थे। धारिया सम्मेलन में नहीं आ पाए और उनकी आ॓र से सम्मान उनकी पुत्री को दिया गया।
सम्मानित भारतीय विद्वान
डा. अजीत गुप्ता
अरविंदाक्षन
बेकल उत्साही
डा. जगदीश पीयूष
डा. कृष्णदत्त पालीवाल
लल्लन प्रसाद व्यास
एम. शेषन
डा. मानीक्यम्ब पेरूमला
प्रो. निर्मला जैन
आ॓म विकास
प्रेमशंकर गुप्त
शांता बाई
सुनीता जैन
सूर्यवंशी चौधरी
स्वदेश भारती
सम्मानित विदेशी विद्वान
डा. बीरसेन जुगसिंग (मारीशस)
प्रो. डोनाटेला डोलसिनी (इटली)
डा. इवा अरादी (हंगरी)
डा. गेनादी शोल्म्पर (इस्राइल)
हरिदेव सहतो (सूरीनाम)
प्रो. हर्मन वान आ॓ल्फेन (अमेरिका)
जियांग जिंगकुई (चीन)
डा. मोहनकांत गौतम (हालैंड)
प्रो. उस्मानोव (ताजिकिस्तान)
डा. पद्मेश गुप्ता (इंग्लैंड)
डा. सुरेंद्र गंभीर (अमेरिका)
प्रो. ताकेशी फुजी (जापान)
डा. मुखीबोवा (उजबेकिस्तान)
प्रो. वू जो किम (दक्षिण कोरिया)
आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून तथा तीस से अधिक देशों के राजनयिकों की उपस्थिति से हिंदी को विश्व संस्था की अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने प्रयास तेज हो चुके हैं। हिंदी के इस अभियान से जहां उत्साह का माहौल है वहीं वस्तुस्थिति से भी इनकार नहीं किया जा सकता। वस्तुस्थिति पर बारीकी से नजर डालता अरविंद खरे का यह लेख :-
उठती हिंदी
* विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रांगण में विराट हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन से राष्ट्र भाषा विश्वमंच पर आ गई है।
* आकड़े बताते हैं कि 1981 में संस्कृत भाषियों की संख्या 6016 थी जो 1991 में बढ़ कर 49 हजार हो गई।
* वहीं जहां 1981 की जनगणना में दो लाख लोगों ने अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा बताया था वहीं 1991 में ऐसे लोगों की संख्या 1 लाख अस्सी हजार हो गई।
* हिंदी के प्रचार-प्रसार में एक कारण मुंबई फिल्म इंडस्ट्री का भी है। तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ और बांग्ला भाषा में फिल्मों की संख्या हिंदी फिल्मों से दो गुने से ज्यादा है। लेकिन सिनेमा दर्शकों के आंकड़े कहते हैं कि हर पांच में से चार दर्शक हिंदी फिल्मों के ही होते हैं।
आरोपों की झड़ी-
* आलोचकों का मानना है कि विदेशों में ऐसे विशाल आयोजनों में देश का पैसा फूंकने के बजाए देश में ही हिंदी के प्रचार-प्रसार, शब्दकोष बनाने और जागरूपता फैलाने में किया जाता तो बेहतर होता।
* आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन को कुछ लोग विदेशयात्रा का चस्का पूरा करने का जरिया बना रहे हैं। आरोप ऐसे भी हैं कि एक ‘साहब’ की निजी सचिव को इस सम्मेलन के जरिए न्यूयार्क घुमाने के लिए रातों रात इंटरनेट पर हिंदी विषय की विदुषी बना दिया गया।
* सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि जो ‘विद्वान’ देश में हिंदी को सम्मान दिलाने में कामयाब नहीं रह पाए, वही भला संयुक्त राष्ट्र संघ को ऐसा करने के लिए कैसे राजी करवा पाएंगे।
* कुछ आलोचकों का मानना है कि हिंदी के साथ यह भी दुर्भाग्य है कि देश में ही इसका सम्मान नहीं होता तो हम बाहर सम्मान की आकांक्षा कैसे कर सकते हैं? भारत की आजादी के बाद बहुत से देशों ने अपने विश्वविघालयों में यह सोचकर हिंदी विभाग खोले थे कि भारत से बेहतर राजनयिक-व्यापारिक संबंधो के लिए वहां की भाषा जानना जरूरी है लेकिन जब देखा गया कि भारत में ही हिंदी की कद्र नहीं है तो विदेश के कई विश्वविघालयों ने अपने यहां हिंदी विभाग बंद कर दिया। हाल ही में कैंब्रिज विश्वविघालय ने अपने यहां हिंदी और संस्कृत विवि बंद कर दिए हैं।
तथ्य :
* 1949 में संविधान सभा ने जब हिंदी को राजभाषा देने की बात कहीं थी तब यह भी प्रावधान था कि 15 वर्षाें तक सरकारी पत्राचार या कामकाज में हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी होंगे, 15 वर्षाें बाद सरकारी काम केवल हिंदी में होंगे।
* एक अनुमान के मुताबिक 2047 तक दुनिया में अंग्रेजी बोलने वालों में सबसे ज्यादा भारतीय होंगे।
* जाने माने पटकथाकार व फिल्म निर्माता सलीम खान का मानना है कि अंग्रेजी से उनको कोई विरोध नहीं है परंतु अंग्रेजी जहूनियत जिसे अंग्रेजियत कह सकते है, ने कई लोगों को अपने ही मुल्क में विदेशी बना दिया है। इस अंग्रेजीयत की वजह से नागरिकों में संवादहीनता पैदा हो गई है।
* दुनिया का अस्सी फीसदी ज्ञान-विज्ञान और साहित्य का खजाना गैर अंग्रेजी भाषी लोगों ने बनाया है। रूस, जापान और चीन ने जो भी तरक्की की अपनी भाषा से जुड़ कर की।
* कुछ दिनो पहले उत्तरप्रदेश के राज्यपाल टी. राजेश्वर ने कहा था कि आगे बढ़ना है तो अंग्रेजी पढ़ो।
साक्षात्कार : हिंदी को सरकारी ठप्पे की जरूरत नहीं
हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव से ओंकारेश्वर पांडेय की बातचीत
न्यूयार्क में आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया है। आपको भी बुलाया गया था। क्यों नहीं गए?
मैं ही क्यों, महाश्वेता देवी भी नहीं गईं। नामवर सिंह नहीं गए। और भी बहुत सारे लोग नहीं गए। लेकिन हमारे न जाने का 80 प्रतिशत कारण हिंदी की जड़वादी प्रचार पद्धति है।
सम्मेलन में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र से विश्व भाषा का दर्जा दिलाने के बारे में बातें हुईं। विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने उसके लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का प्रयास करने का आश्वासन दिया है। आप क्या कहेंगे?
मैं लेखक हूं। अगर हमने सरकारी ठप्पा नहीं लगवाया, तो क्या लोग मुझे हिंदी का लेखक नहीं मानेंगे? इसलिए मैं चाहता हूं कि हिंदी को सरकारी ठप्पे की जरूरत नहीं है। बल्कि सच तो यह है कि सरकार जिसको सर्टिफिकेट देती है, उसके प्रति मन में संदेह पैदा होता है। इसी सरकारी ‘सद्भाव’ ने दक्षिण को हिंदी का शत्रु बना दिया। वरना इंदिरा गांधी के जमाने में या उससे पहले जिन दिनों हिंदी विरोधी आंदोलन चल रहा था, उन दिनों भी वहां हिंदी फिल्में हाउसफुल चलती थीं। रामायण, महाभारत जैसे टीवी सीरियलों की लोग प्रतीक्षा करते थे।
लेकिन सरकारी ठप्पे से विरोध कैसे पैदा हो गया?
असल में केंद्र सरकार की पॉलिसी इतनी हस्तक्षेपकारी थी कि लोगों को उससे दिक्कत होती थी। नतीजतन तमिलनाडु में केंद्र के खिलाफ प्रतिरोध दिखाई देने लगा। हिंदी इस राजनीति का शिकार हुई। आज से पहले ‘दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचार सभा ’ की परीक्षाओं में 10 से 12 लाख अहिंदी भाषा-भाषी लोग बैठते थे। हिंदी का यह प्रचार स्वाभाविक रूप से हुआ है।
न्यूयार्क सम्मेलन में सरकार ने हिंदी को आगे बढ़ाने की बात की है। क्या उससे फायदा नहीं होगा?
सरकार कहां हिंदी का प्रचार करती है? बल्कि सरकार तो रोकती है। विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों में हिंदी की किताबें बंडलों में पड़ी धूल फांकती हैं।
तो यह सम्मेलन व्यर्थ हो गया?
मैं ये नहीं कह रहा। साल में एक बार सम्मेलन कर देने भर से और प्रस्ताव पारित कर लेने से किसी भाषा का विकास होता है? अगर हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन भी गई तो इससे सिर्फ झूठे किस्म का आत्म गौरव ही हासिल होगा।
सही मायने में हिंदी विश्व भाषा के रूप में उभरे, उसके लिए क्या करना चाहिए?
अब अकेले इस सम्मेलन में प्रत्यक्ष-परोक्ष करीब 800 लोग गए। चार-पांच करोड़ रूपये तो खर्च हुए ही होंगे। हमने सुझाव दिया था कि इतना ही पैसा लगाकर क्यों नहीं हिंदी का विश्व कोष बनाया जाए। अफसोस है कि आज तक हिंदी का विश्वकोष ही नहीं है और हम इसे विश्व भाषा बनाने चले हैं।
ग्लोबलाइजेशन का हिंदी पर क्या प्रभाव पड़ा है?
ग्लोबलाइजेशन का अच्छा प्रभाव ये पड़ा है कि अंग्रेजी में हिंदी का प्रचलन होने लगा है। दो बड़े मीडिया हाउस से मिलकर निकाला गया एक अंग्रेजी दैनिक आज धड़ल्ले से हिंदी के शब्दों का प्रयोग शीर्षकों में कर रहा है। हिंदी अखबार तो अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करते ही हैं। इससे नई भाषा विकसित हो रही है। इससे शब्दों/संस्कृतियों का आदान-प्रदान बढ़ेगा।
ग्लोबलाइजेशन और सूचना क्रांति के इस दौर में नए-नए तकनीकी विषय और शब्द सामने आ रहे हैं, कई बार हिंदी में उसके लिए शब्द नहीं मिलते। ऐसे में क्या हिंदी में नए तकनीकी शब्द गढ़ने की जरूरत है?
हिंदी के तकनीकी शब्द बनाना आसान नहीं है। यह अपने आप होगा। अब ‘कंप्यूटर’ को लोग ‘संगणक’ तो नहीं कहेंगे। तो हिंदी स्वत: ऐसे शब्दों को समाहित करती जाएगी। हिंदी बहुत लचीली भाषा है। यह बहुत जल्दी क्षेत्रीय व अन्य भाषाओं से शब्द सोख लेती है। मुंबई में मुंबइया हिंदी, कोलकता में कलकतिया हिंदी चल ही रही है। हमें इसको मानने में कोई आपत्ति नहीं है। जो चीजें स्वाभाविक ढंग से बढ़ती हैं, उनमें सरकार का हस्तक्षेप हमें पसंद नहीं।
हिंदी को स्वाभाविक विकास के लिए किन चीजों से बचने की जरूरत है?
एक, सरकार से और दूसरा विश्वविघालयों से। अब हमारे यहां हिंदी की तीन अच्छी टाइपिस्ट लड़कियां थीं। उनकी इसी योग्यता के आधार पर उन्हें सरकारी नौकरी मिल गई। पर वहां तीनों को अंग्रेजी टाइपिस्ट बना दिया गया। अब विश्वविघालयों का हाल देखिए। वहां जो भाषा पढ़ाई जाती है, उसका कोर्स इतना खराब है कि हिंदी से अरूचि हो जाए।
अगर आपको हिंदी प्रचार का जिम्मा दे दिया जाए तो क्या करेंगे?
मैं ‘विजुअल’ माध्यम पर ध्यान केंद्रित करूंगा। देश में आज भी बड़ी अशिक्षा है। पर देखते सब हैं। तो ‘विजुअल’ के माध्यम से ज्यादा विकास हो सकता है। टेलीविजन के माध्यम से बखूबी हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है, उसे बढ़ाना चाहिए।
हिन्दी में बोले मून कहा बहुत सुंदर भाषा है आपकी
न्यूयार्क। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए 32 वर्ष पहले भारत में लिए गये संकल्प को संयुक्त राष्ट्र भवन में दोहराया गया। संसार भर में फैले एक अरब से ज्यादा हिन्दी भाषियों के आठवें महाकुंभ में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने हिंदी बोलकर प्रतिनिधियों को गद्गद कर दिया।
उद्घाटन सत्र में महासचिव ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में कहा ‘नमस्ते क्या हाल चाल है’। धारा प्रवाह हिंदी न बोल पाने पर अपनी बेबसी जाहिर करते हुए उन्होने कहा हिंदी बहुत सुंदर भाषा है। इसे मैंने भारत स्थित कोरिया दूतावास में रहते हुए मेक्समूलर भवन के जरिए सीखा था। मून ने कहा मेरा बेटा भारत में पैदा हुआ। मेरी बेटी की शादी भारतीय से हुई है। जल्द ही कोरिया और भारत का ‘ज्वाइंट प्रोडक्ट’ आने वाला है। मेरा दामाद बहुत अच्छी हिंदी बोलता है। महासचिव ने हिंदी के महत्व को रेखांकित किया और अंत में हिंदी में ही कहा सम्मेलन में भाग लेते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं आपको शुभकामनाएं देता हूं। नमस्ते और धन्यवाद। प्रतिनिधियों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ मून का आभार व्यक्त किया। मून के आने से आनंदित विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा यह सम्मेलन यहां करना कितना उचित और सामयिक था इसका जवाब आपको मून के भाषण से मिल गया होगा। मून के उद्घाटन भाषण के बाद तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन को प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने दिल्ली से वीडियो संदेश के जरिए आश्वस्त किया कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की दिशा में हम कार्य कर रहे हैं। उन्होेंने कहा कि इस सम्मेलन में पारित प्रस्तावों पर भी तेजी से कार्रवाई की जाएगी। उद्घाटन सत्र में सभी वक्ताओं ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का जो आग्रह किया।
भारत के राष्ट्रगान के साथ शुरू हुए सम्मेलन में भले ही हिंदी के कई बड़े हस्ताक्षर विरोध या मजबूरी में शामिल नहीं हुए हों फिर भी गुलजार , ज्ञानपीठ से सम्मानित इंदिरा गोस्वामी , मृणाल पांडे,चित्रा मुद्गल,कन्हैया लाल नंदन और आ॓म थानवी के साथ ही अन्य देशों के कई हिंदी विद्वान यहां नजर आए। अमेरिका में भारत के राजदूत रणेंद्र सेन ने स्वागत भाषण दिया। भारत से साढे़ चार सौ और अन्य देशों के करीब 250 प्रतिनिधि यहां सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे हैं। भारत सरकार का प्रतिनिधित्व विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा कर रहे हैं। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष और प्रख्यात संस्कृत विद्वान कर्ण सिंह सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विशेष दूत हैं।
कब कहां विश्व िहन्दी सम्मेलन
* पहला- 1975,नागपुर में
* दूसरा- 1976,पोर्ट लुई में
* तीसरा-1983,नयी दिल्ली में
* चौथा-1993,पोर्ट लुई में
* पांचवां-1996,पोर्ट आफ स्पेन में
* छठा-1999, लंदन में
* सातवां-2003,पारामारिबो सुरीनाम में
* आठवां-2007,न्यूयार्क में