मोहल्ला

पीछे हिंदुत्‍व का एजेंडा है

 

कृष्‍णा सोबती

नया ज्ञानोदय विवाद की नयी कड़ी ये है कि हिंदी साहित्‍य की संजीदा शख्‍सीयत कृष्‍णा सोबती ने भी संपादक की कार्रवाइयों की भर्त्‍सना की है। नासिरा शर्मा के बहाने मुलायमियत के साथ हिंदुत्‍व के एजेंडे पर काम करने की साज़‍िश पर कृष्‍णा सोबती ने जिस तरह से उंगली रखी है, वह हम सबसे सलामी मांगता है। जनसत्ता के 12 अगस्‍त के अंक में प्रतिक्रियाओं-प्रतिवादों की पूरी फेहरिस्‍त छपी है, जिन्‍हें अख़बार के स्‍थानीय संपादक ओम थानवी ने मोहल्‍ले को मुहैया कराया है। हम उनके आभारी हैं और बारी-बारी से इन्‍हें प्रकाशित कर रहे हैं।

शर्म तुमको मगर नहीं आती पढ़ कर शर्मसार तो हम लेखक, नागरिक हुए हैं, जो अपने रचनात्‍मक मर्म, कर्म और परिश्रम से राष्‍ट्र की साहित्‍य संपदा में बढ़ोत्तरी करते हैं। सिरजित करते हैं। जनमानस का साहित्‍य रचते हैं। गहरा शोक इस बात का है कि राष्‍ट्र के स्‍वाधीनता पर्व में लेखक बिरादरी द्वारा लगातार प्रस्‍तुत किया जाने वाला लोकतंत्र का आख्‍यान, राष्‍ट्रीय वृत्तांत और समाज में हो रहे परिवर्तनों का ताना-बाना प्रस्‍तुत करने वाला लेखक-समाज जिस एजेंडे के तहत कठघरे में खड़ा कर दिया गया है, वह सोच-समझ कर की जाने वाली संकीर्ण रणनीति का परिणाम है।

नया ज्ञानोदय में उछाले गये विवाद से लगता है जैसे लेखक, मात्र पुरस्‍कार और सम्‍मान के लिए लिखता है। लेखक अपनी साहित्‍य-साधना से और पाठकों से जो पहचान अर्जित करता है, नया ज्ञानोदय एक तरफ मील का पत्‍थर शीर्षक तले उसे प्रस्‍तुत करता है, दूसरी तरफ लेखक को अभिव्‍यक्ति की नसीहतें देता है। इसे क्‍या कहेंगे? साहित्यिक हथकंडे?

उनकी मुद्रा में कुछ ऐसा है, जैसे पास में संपादक की कुर्सी नहीं, हस्‍ती में जड़ी लाइसेंस की बंदूकची और संदूकची हों। क्‍या समझे? ये लेखकों को समझाना चाहते हैं। डराओ, धमकाओ और उन्‍हें अपने पाले में लाओ। यह पूरे लेखक समुदाय के लिए बहुत अपमानजनक है।

इस प्रसंग का संबंध संकीर्ण विचारधारा के शब्‍दों हिंदू और मुसलमान से है। पुरस्‍कारों और सम्‍मान से भी। हिंदी की मुख्‍यधारा की विशिष्‍ट लेखिका नासिरा शर्मा, जो साहित्‍य संसार में अपनी उदार मानवीय वैचारिक क्षमताओं के लिए जानी जाती हैं, उन पर लिखे संस्‍मरण के किसी शब्‍द के बहाने हिंदुत्‍व के जिस एजेंडे को प्रवाहित किया गया है, वह अद्भुत है। इसके लिए कमल किशोर गोयनका को क्‍यों तक़लीफ दी गयी, यह सब पर जाहिर है।

इस अपमानजनक हादसे के लिए लेखक समुदाय सामूहिक रूप से इसकी भर्त्‍सना करता है और ज्ञानपीठ के सहिष्‍णुतावादी ट्रस्‍ट से अनुरोध करता है कि नासिरा शर्मा के नाम के जरिये अल्‍पसंख्‍यकों और बहुसंख्‍यकों को जोड़ कर और नासिरा पर बहुविध सामग्री के बाद संपादकीय को अपने मन मुताबिक मोड़ कर जो टिप्‍पणी की गयी है, वह अपने आपमें इस बात का प्रमाण है कि पुरस्‍कार प्रसंग का किस तरह अर्थ का अनर्थ किया गया है।

नासिरा शर्मा को कई पुरस्‍कार मिल चुके हैं। वह यक़ीनन ज्ञानपीठ की ओर इशारा नहीं कर रही थीं। लेखक इतने अनपढ़ नहीं कि ऐसे सार्वजनिक विषय पर बार-बार यह कहें कि फलां पुरस्‍कार मुसलमान को नहीं मिल सकता। इस गढ़े हुए वाक्‍य पर पहले संपादकीय, फिर भाजपाई टिप्‍पणी मील के पत्‍थर की रणनीति स्‍वयं प्रकट करती है। यह संपादक द्वारा खेले गये पुराने खेलों की तरह पीली पत्रकारिता की झलक देता है।

अकारण नहीं कि ग्राहक संख्‍या बढ़ाने के लिए इन तरक़ीबों में सबसे पहले किसी महिला-लेखक को घेर लिया जाता है। दिलचस्‍प यह भी है कि पुरस्‍कार-सम्‍मान आदि को लेकर संपादक महोदय का गहरा ओबसैशन है। उनके लिए गाहे-बगाहे यह ज़ाहिर करना भी ज़रूरी है कि वे पुरस्‍कारों की चयन समितियों के अलावा भी महत्वपूर्ण हलकों में प्रभावशाली हैं। कुछ ही महीने पहले उन्‍होंने मुझे फोन कर कहा कि उत्तर प्रदेश साहित्‍य संस्‍थान ने पूछा है, क्‍या आप ‘भारत भारती’ सम्‍मान लेना पसंद करेंगी? हमने जवाब दिया- सौ क्‍या, दो सौ प्रतिशत नहीं।

हम कितना हंसे होंगे उस शाम, इसका अंदाज़ा आप ज़रूर लगा सकते हैं। कहां था चयन समिति का निर्णय? कहां था लेखक को संबोधित किया जाने वाला महत्वपूर्ण पत्र, कहां थी उसकी सूचना! टेलीफोन पर खैरात बांटी जा रही है? वह भी सभी-कुछ एक हस्‍ती में जमा! अगर खुदा न ख्‍वास्‍ता हमारा मामूली फोन नहीं लगता तो शायद अगला नंबर नासिरा जी का ही आ जाता। मुसलमान होने के बावजूद। पर वह शर्माजी की पत्‍नी भी हैं। हो सकता इस भार-तौल में अगला लेखक चित्त हो जाता। नासिरा के मुंह से तथाकथित यह इबारत कोर्ट-कचहरी की याद न दिलाती है। बहरहाल, लेखक समाज की और कुछ बड़े पुरस्‍कारों की असलियत आपके सामने है।

लेखक किस विधा का है।
किस क्षेत्र का है।
उसका सामाजिक भार-तौल कितना है।
ब्राह्मण है, ठाकुर है, कायस्‍थ, जाट, यादव, दलित या पिछड़ा या महिला।
राजनीति में कैसा नाम है।

इतनी प्रत्‍यक्ष नाटकीयता की जानकारी रखने वाली नासिरा शर्मा किसी अनौपचारिक बातचीत के फंदे में फंसने वाली नहीं हैं। नासिरा शर्मा की पहचान एक समझदार, चौकन्‍ने, प्रबुद्ध व्‍यक्ति की है। क्‍या सचमुच आप यक़ीन करेंगे कि उसने बार-बार कहा होगा कि पुरस्‍कार मुसलमान को मिल ही नहीं सकता!

जहां तक दिल्‍ली के पुरस्‍कारों की बात है, उस पर दिल्‍ली वाले मज़ाक़ किया करते हैं कि उधर क्‍या देखना। हिंदी विभाग अपने प्रियजनों को दिलवा लेगा, तभी तो दिल्‍ली वालों के लिए कुछ बचेगा।

नया ज्ञानोदय में नासिरा शर्मा के कथन को जिस तरह तोड़-मरोड़ कर प्रकाशित किया गया है, वह ग्राहक संख्‍या बढ़ाने के कुचक्र में कुछ ऐसे पेश है, जैसे मुसलमान होने के नाते नासिरा शर्मा झुंझला रही हों।

पीली पत्रकारिता से बस आप इंच भर ही दूर हैं। आपकी कलाकारी और कारसाज़‍ियां आपके प्रदेश में मशहूर हैं। आपने आते ही नासिरा पर हाथ डाला, यह अच्‍छा नहीं किया। साहित्‍य के लिए आप में कुछ भी आदर-भाव है, तो सार्वजनिक रूप से लेखकों के सामने अपनी ग़लती कबूल कीजिए। नासिरा शर्मा के फोन से पहले ही आप वह दस साल पुरानी तर्ज वाला संपादकीय प्रेस को भेज चुके थे। लेखकों के विरोध या प्रतिवाद की कोई परवाह न करें और ‘मिस-कोट’ से उनका बौद्धिक ब्‍लैकमेल करे, वह कितना भी पहुंचा हुआ हो- एक अच्‍छा संपादक कभी नहीं कहलाएगा।

मुख्‍यधारा की वरिष्‍ठ लेखिका, जिसके व्‍यक्तित्व और अभिव्‍यक्ति पर हम गर्व कर सकते हैं, उसकी छवि को मलिन करने में आपको ज़रा झिझक नहीं हुई? इसके लिए हम अपना विरोध दर्ज करते हैं और आपसे अपेक्षा करते हैं कि नया ज्ञानोदय की ओर से अपनी ग़लती के लिए खेद प्रकट करेंगे।

हम ज्ञानपीठ जैसे अखिल भारतीय साहित्यिक संस्‍थान से भी यह अनुरोध करते हैं कि पत्रिका को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक संपादक मंडल की व्‍यवस्‍था करें, ताकि ऐसे विवाद भविष्‍य में दुबारा न उठें। किसी भी अच्‍छी पत्रिका से न लेखक दूर रहना चाहेंगे, न पाठक!

मोहल्ला
Published in: on August 1, 2007 at 2:15 pm Comments (0)

भारत भवन

स्वतंत्रता की 60 वीं वर्षगांठ पर विशष
    सुश्राषचन्दबोस को हिन्दी पढ़ा चुके हैं अग्निहोत्री।आज़ादी की लड़ाई के दौरान यूपी के सबसेखतरनाक युवकोa में से एक माने जाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार डा.प्रभुदयाल अग्निहोत्री अब अपनs स्वास्थ्स से जूझ रहे हैं।उन्हें नेताजी सुभाषचन्द बोस जैसे महान क्रान्तिकारी को पढ़ाने का भी गौरव प्राप्त है।
                 डा.अग्निहोत्री व्दारा रचित पुस्तकों की संख्या 75 से भी अधिक है। भारत के राष्टपति ने उन्हे सर्टिफिकेट आफ आनर के साथ 50 हजार रूपए वार्षिक आजीवन सम्मान निधि के रूप में पुरस्कृत किया।
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मनोज श्रीवास्तव संभाल सकते हैं न्यासी सचिव का कार्यभार
भोपाल।बहुकला केन्द्र भारत भवन के न्यासी सचिव रामेश्वर मिश्र पंकज व्दारा स्वीकार नहीं किया गया है।लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि सोमवार को संस्कति सचिव मनोज श्रीवास्तव को न्यासी सचिव का कार्यभार सौंप दिया जाएगा दूसरी ओर यह भी सुनने में आ रहा है कि न्यास अध्यक्ष दया प्रकाश सिन्हा के इस्तीफा देने के लिए राजी न होने की स्थिति में उन पर इस्तिफे के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है।
     एक खबर यह भी है कि संस्कति सचिव लक्ष्मीकान्त शर्मा का विभाग बदला जा रहा है।इसलिए भारत भवन के मसले पर निर्णय लेने में वे जल्दबाजी नहीं करेंगे।
                       –.सान्ध्य प्रकाश दिनांक 09 अगस्त 2007 से साभार

Published in: on at 2:07 pm Comments (0)