साहित्‍य में सफल होने का फण्‍डा

साहित्‍य में सफल होने का फण्‍डा

April 11, 2008

    साहित्‍य में सफल होने का फण्‍डा

     अक्‍सर देखने एवं अनुभव में यह आया है कि हमारे भारत वर्ष की आबादी यानि एक अरब तीस करोड में से लगभग एक करोड भारतियों को साहित्‍यकार बनने की बीमारी लगी है। यह बीमारी ऐसी है जिसका कोई इलाज नहीं है  अर्थात लगभग लाइलाज बीमारी है । यदि आपको भी यह बीमारी लग गई हो तो इससे बचने के उपया करना अब से ही प्रारंभ कर दीजिए । क्‍योंकि वैसे यह बीमारी बडी अच्‍छी बीमारी है किन्‍तु इसके बेक्‍टेरिया यदि आपको शूट कर जाए तो आप चन्‍द समय में ही साहित्‍य आकाश में व्‍याप्‍त हो जाएंगे और यदि साहित्‍य के बेक्‍टेरिया आपके अनुकूल नहीं है तो आप ताजिन्‍दगी एडिया रगडते रहिए आपको कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है ।  मेरा भी अनुभव कुछ इसी तरह का है । यह बीमारी मुझे बारह वर्ष की आयु से ही लगी है और इसका मेरे पास कोई इलाज नहीं है । इतना ही नहीं मेरे पास इस बीमारी के बेक्‍टेरिया भी अनुकूल नहीं है। सारे बेक्‍टेरिय प्रतिकूल है । इसका कारण यह है कि मैं अनुकूल बेक्‍टेरिया अब तक क्रय नहीं कर पाया अथवा यों कहें कि अनुकूल बेक्‍टेरिया की तलाश या तो मैं नहीं कर पाया अथवा अनुकेल बेक्‍टेरिया मुझे पसन्‍द ही नहीं करता । खैर , कोई बात नहीं । मैं इस बीमारी की चिकित्‍सा भी जानता हूँ किन्‍तु अफसोस कि  इस बीमारी की दवा भी वे ही अनुकूल बेक्‍टेरिया है जो मेरे पास नहीं है । यूँ तो मैं साहित्‍य में सफल होने का फण्‍डा बता रहा हूँ।

     पहला फण्‍डा

           यदि आपके परिवार में कोई प्रथम श्रेणी का अधिकारी है जैसे व्‍याख्‍याता , प्राचार्य , आई ए एस , आई पी एस या आई एफ एस अधिकारी ,यथा शासन में उच्‍चस्‍तर पर डिप्‍ली कलेक्‍टर , कलेक्‍टर ,कमिश्‍नर , डीजी ,एडीजी , आई जी , डी आई जी , सचिव, उप सचिव ,प्रमुख सचिव ,डायरेक्‍टर , डिप्‍टी डायरेक्‍टर , सहायक संचालक ,रजिस्‍टार , डिप्‍टी रजिस्‍टार , आकाशवाणी या दूरदर्शन के किसी उच्‍च स्‍तर के अधिकारी या इसी तरह के किसी अधिकारी स्‍तर का हो तो बहुत ही अच्‍छा है । ये आपके रास्‍ते स्‍वयं ही खोल देते हैं । यदि‍ आपके परिवार में नहीं है तो  आप इस स्‍तर के उच्‍च अधिकारी बनने की कोशिश कीजिए । फिर देखिए आप स्‍वयं ही उच्‍चस्‍तरीय साहित्‍यकार के रूप मे प्रतिष्टित हो ही जाएंगे । यह फण्‍डा , वैसे तो कीमती बहुत है किन्‍तु यदि आप इसमें से कुछ है तो साहित्‍य आकाश में आपका नाम स्‍वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा ।

 

     व्दितीय फण्‍डा

          व्दितीय फण्‍डा वैसे तो बहुत ही कठिन है किन्‍तु यदि आपने इस फण्‍डे को साध लिया तो आपके बल्‍ले बल्‍ले हो जाएंगे । यह फण्‍डा है पहले फण्‍डे में उल्लिखित उच्‍चस्‍तरीय अधिकारी रूपी साहित्‍यकार के आप तलवे चाटने लग जाएं या आप उच्‍चस्‍तरी अधिकारी रूपी साहित्‍यकार की जी हुजूरी करने लग जाय ,यदि आप यह भी नहीं कर सकते तो कम से कम उनके चमचे बन जाए फिर देखिए आप भी साहित्‍य आकाश के व्दितीय सितारे बन जाएंगे ।

      तीसरा फण्‍डा

         तीसरा फण्‍डा बहुत अधिक तो नहीं किन्‍तु है खर्चीला । इस फण्‍डे में आपको अपनी जेबें खाली करनी होगी । यदि आपमें कूवत है तो आप इस फण्‍डे से भी  साहित्‍य आकाश के सितारे बन सकते हैं किन्‍तु जरा संभल कर , इस रास्‍ते में खतरे भी कम नहीं है;;;;;;; बाबूजी धीरे चलना तीसरे फण्‍डे में संभलकर ;;;;;;;;

 

        साहित्‍य आकाश में सफलता के यह फण्‍डे व्‍यंग्‍य नहीं है । मैं आपको व्‍यंग्‍य नहीं सुना रहा बल्कि वास्‍तविकता से रू ब रू करवा रहा हूँ । ये मेरे कडवे अनुभव है । इन्‍हें आजमाकर देखिए और सफल हो जाइए ।

                        अभी दो दिन पहले मैं किसी अकादमी के अधिकारी से मिला था । उन्‍होंने बताया कि साहित्‍य में सफलता आसान नहीं है । जैसे ए से जेड तक की सीढी में ए से बी तक आने में पसीना छूट जाता है तो फिर ए से जेड तक पहुँचने में व्‍यक्ति की स्थिति कैसी हो सकती है । उन्‍हें भी इसका अच्‍छा खासा अनुभव है इसलिए वे भी इस दु:ख को बयान करते हैं । अन्‍त में यही कहना चाहूँगा कि———–

               वे लिखते हैं तो वेद वाक्‍य कहलाते हैं ।

                 हम लिखें तो डिब्‍बे का कचरा कहलाता है ।।

       एक वाकया कुछ यूँ है —– मैं अपनी दो रचनाएं और ख्‍यातिनाम साहित्‍यकार की दो रचनाएं मिलाकर एक उच्‍चस्‍तरीय साहित्‍यकार के पास पहुँचा । उनको ये चारों रचनाएं बताकर कहा कि यह चारो रचनाएं मेरी अपनी है , मेरी स्‍वरचित है और इसे आकाशवाणी से प्रसारित करवाना चाहता हूँ । उन्‍होने चारों रचनाएं एक बारगी पढी और  झल्‍ला उन्‍हें कचरे की टोकरी में फेंकते हुए मुझसे कहा —-

              भई सोनाने , पहले आप साहित्‍य का ए बी सी डी पढें । उसके बाद लिखने की कोशिश करें तो काम बन सकता है । अभी तो आप अनाडी है ।

       मैंने पूछा –

                           श्रीमान क्‍या चारों रचनाएं रददी के समान है ।

       उन्‍होंने कहा –

                         अरे श्रीमान ये रददी के समान नहीं । ये तो स्‍वयं रददी है ।

मैंने उन्‍हें जाते जाते कहा –

                        इन चारों रचनाओं में एक रचना हरिवंशराय बच्‍चन तथा एक रचना अशोक वाजपेयी की थी ।

          वे बोले –

                        क्‍या कहा आपने

       मैंने कहा –

   

             जो आपने सुना ।   

मैं उन्‍हें अधिक नहीं बोला और आकाशवाणी के उस कक्ष से बाहर निकल आया । मुझे आज भी वह दिन याद है ।

                          —-कृष्‍ण शंकर सोनाने

Published in: on April 29, 2008 at 2:40 am

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