यहां प्रस्तुत है पिछले दिनो उनके साथ एकाधिक मुलाकातो मे हमारे संवाददाता वंदना मिश्र से हुई बातचीत के कुछ अंश :-
* आपको कृष्णकली से अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली। उससे पहले आप क्या लिख रही थी?
- लिखती तो मै पहले से थी। मैने लेखन की शुरुआत बंगला से की थी। बंगला मे लिखी मेरी पहली कहानी मरीचिका 1937-1938 मे सोनार बांगला मे प्रकाशित हुई थी। 1951 मे मैने अपनी पहली हिन्दी कहानी लिखी- जमींदार की मुक्ति जो धर्मयुग मे प्रकाशित हुई। मेरा उपन्यास मायापुरी 1957 मे प्रकाशित हुआ था।
* आपकी पहली कहानी 1937-38 के बीच आयी। इसके बाद फिर आपकी कहानी 1951 मे प्रकाशित हुई। इतने लम्बे अन्तराल का कोई विशेष कारण था?
- नही, कोई विशेष कारण नही। मै उस समय पढ रही थी। अन्य गतिविधियो मे सक्रिय रहती थी। 1945 मे मेरा विवाह हुआ। उसके बाद मैने व्यवस्थित ढंग से लिखना प्रारंभ किया।
* अपनी रचनाओ की लोकप्रियता का कारण आप स्वयं क्या मानती है?
-सरल को कहना कठिन है और मै सरल को सरल ढंग से कह देती हूं। अपनी लोकप्रियता का एक कारण मै अपनी भाषा को मानती हूं। मैने अनेक भाषाएं सीखी, उन सभी भाषाओ का रंग मेरी भाषा मे अपने आप सहज भाव से उतर आता है। उसमे गुजराती, बंगाली सभी अपनापन महसूस करते है।
दूसरे, मैने अपनी कहानियो का विषय हमेशा यथार्थ से लिया है और उसके बारे मे ईमानदारी से लिखा है। दूध मे पानी नही मिलाया। एक और बात है। मैने अपनी रचनाओ मे कभी ऊपर से कृत्रिम ढंग से बौद्धिकता थोपने की चेष्टा नही की।
* आप अपनी लोकप्रियता के तमाम कारणो मे भाषा को प्रमुख मानती है। निश्चय ही आपकी भाषा का एक अपना विशिष्ट रंग है, सम्मोहन है जो आपको आपके साथ के अन्य कथाकारो से अलग पहचान देता है। कहां से पायी आपने यह भाषा?
- मै कुमाउंनी हूं। मेरा जन्म गुजरात मे हुआ। मेरी शिक्षा बंगाल मे हुई। इन सभी जगहो की भाषा के संस्कार मुझे मिले। इसके अतिरिक्त मैने पढा बहुत। संस्कृत, बंगला, गुजराती, हिन्दी सभी भाषाओ का उत्कृष्ट साहित्य मैने पढा है तो सबका प्रभाव मेरी भाषा पर देखा जा सकता है। सहज भाव से जिस भी भाषा का शब्द मेरी लेखनी मे उतरता है मै उसे आने देती हूं, हिन्दी का नही है इसलिए तिरस्कृत नही करती, इसी से मेरी भाषा से सभी को अपनी सी लगती है। हालांकि इसको लेकर कभी-कभी बहुत शोर भी होता है। एक बार मैने कही लिख दिया हृस्व परिधान तो इस पर बडा हंगामा हुआ कि शिवानी तो हिन्दी मे बंगला लिखती है। मै कहती हूं कि जब हिन्दी मे हृस्व मात्रा हो सकती है तो हृस्व परिधान क्यो नहीं हो सकता। भाषा तो सतत् प्रवहमान होनी चाहिए। बंधा पानी पुण्य सलिला नही हो सकता।
* आपके लेखन पर आरोप है कि आपकी रचनाएं एक वर्ग विशेष और क्षेत्र विशेष पर ही केन्द्रित रहती है?
- मै जिस वर्ग की हूं और जहां की हूं, वही की बात लिखती हूं। मेरा लेखन यथार्थ के निकट है। मेरे पिता ओरछा, रामपुर आदि अनेक रियासतो मे दीवान, राजनीतिक सलाहकार, गृहमंत्री आदि पदो पर रहे। मेरी माँ यहां के बहुत प्रसिद्ध डाक्टर की पुत्री थी, अत्यन्त विदुषी थी तो इस वर्ग के सुख-दु:ख मै पहचानती हूं, उनके बारे मे अधिकारपूर्वक लिख सकती हूं।
वैसे यह कहना गलत है कि मैने सिर्फ आभिजात्य वर्ग को ही अपनी रचनाओ का विषय बनाया है। मास्टरनी, करिये छिमा आदि कहानियां इसका प्रमाण है।
* अपनी रचनाओ की समीक्षा को आप किस रूप मे लेती है?
- मै समीक्षा को कोई महत्व नही देती। ज्यादातर समीक्षाएं सतही होती है। समीक्षक बस दोष ही दोष देखते है, वे पूर्वग्रहो से ग्रस्त है। गुटबंदी भी बहुत है। एक गुट के लोग अपने गुट के लेखको को उठाते है, दूसरे को गिराते है। मै अपना समीक्षक अपने पाठको को मानती हूं और मेरे पाठक सिर्फ हिन्दी भाषी ही नही है, गुजराती, बंगाली भाषी पाठक भी मेरा सम्मान करते है। वे मुझे पत्र लिखते है। अपनी राय से, अपने विचारो से मुझे अवगत कराते है। मै उनकी ही राय को महत्व देती हूं।
* लोकप्रिय रचनाकारो से सम्पादक, प्रकाशक प्राय: खास-खास विषय पर लिखने को कह देते है। क्या अपने आप उपजी रचना और मांग पर लिखी गयी रचना मे आप कोई गुणात्मक अन्तर पाती है?
-मै डिमांड पर नही लिखती। मुझसे बहुत बार कहा गया चिपको आन्दोलन पर लिखने के लिए, परिवार नियोजन पर लिखने के लिए, मैने नही लिखा। मै मांग पर नही लिखती, अपने मन से लिखती हूं। मै तस्वीर पर चौखट सजाती हूं, चौखटे मे तस्वीर फिट नही करती।
* लेकिन क्या आप खुद महसूस नही करतीं कि ऐसी तमाम ज्वलंत समस्याएं है जिन पर लिखा जाना चाहिए। आपका इतना बडा पाठक वर्ग है जो आपकी बात ध्यानपूर्वक सुनता है तो क्या उसके लिए आप ऐसे विषयो पर लिखना अपना कर्तव्य नही मानती?
- समाज की समस्याओ पर लिखा है मैने। दहेज पर मेरी कहानी है श्राप जहां मेरा मन आहत होता है, मै लिखती हूं। आतंकवाद पर मैने लिखा, मैनचेस्टर वगैरह के गुरुद्वारो मे जाकर लोगो से मिलकर लिखा। अनेक ऐसी व्यक्तिगत जानकारियो को प्रकाश मे लायी जिनके कारण लोग मेरी जान के दुश्मन बन गये। अब साम्प्रदायिकता के ज्वार को देखकर मेरा मन करता है कि मै अपने मुसलमान बंधुओ पर लिखूं जो हमारे इतने सगे रहे, करीबी रहे।
रविवार में, वामा मे मैने अपने स्तम्भो मे सामयिक विषयो पर लिखा। समाज से अलग रहकर तो कलम उठायी ही नही जा सकती। कई वर्ष पूर्व जगजीवन राम ने ब्राह्मणो के विरुद्ध कुछ कहा था, तो मैने उसका जवाब रविवार मे अपने लेख द्वारा दिया था। उस रविवार की प्रतियां फाडी गयी और उसके विरोध मे कानपुर मे जुलूस निकला था। धमकी भरे फोन आये। तो ऐसा नही है कि मै सामाजिक यथार्थ से कटी हुई हूं। मैने खतरे उठाकर भी सत्य को उद्घाटित किया है।
* गुरुजनो मे आपके साहित्य पर सबसे ज्यादा प्रभाव किसका है?
- सभी से मुझे प्रोत्साहन मिला, संस्कार मिले। हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रभात मुकर्जी सदैव मुझे प्रोत्साहित करते थे। अपनी बडी बहन जयन्ती से भी मैने बहुत कुछ सीखा।
* आप महिला है, माँ है साथ ही कथाकार भी। बच्चो के लिए अच्छे बालसाहित्य के अभाव को एक माँ के रूप मे आपने महसूस किया होगा। आपके हाथ मे सक्षम लेखनी है, आपने इस विषय मे क्या किया?
- बच्चो के लिए कुछ लिखने की बात मेरे मन मे बहुत समय से थी-जब मैने बचपन मे सुकुमार राय की अबोल-तबोल पढी थी। मै हमेशा सोचती हूं कि ऐसी कोई चीज हिन्दी मे बच्चो के लिए क्यो नही है। मैंने बच्चो के लिए भूत अंकल, स्वामिभक्त चूहा, आइस्क्रीम महल आदि लिखी है।
* आपके अनेक उपन्यासो मे नाटकीयता का तत्व प्रबल है। इससे आपको कभी अपनी किसी ऐसी कृति पर फिल्म बनाने का ख्याल नही आया?
- नही, मुझे तो नही आया लेकिन अनेक फिल्मकारो ने जरूर मुझसे मेरी रचनाएं मांगी है फिल्म बनाने के लिए। कई तो ले भी चुके है।
* कोई दूसरा व्यक्ति आपकी कहानी पर फिल्म बनाएगा। आपकी कहानी, उसके पात्रो के साथ कही अन्याय न हो इसलिए क्या खुद भी फिल्म निर्माण की प्रक्रिया से जुडना चाहेगी?
- फिल्म मेरी विधा नही है, उसके बारे मे जानती नही हूं तो क्या कर पाऊंगी उसके साथ जुडकर। कहानी लेकर वे चाहे जो करे, यह उनका काम है।