साहित्यकार की प्रतिबद्धता

साहित्यकार की प्रतिबद्धता   

हिंदी जगत में लेखक की वैचारिक प्रतिबद्धता ही लंबे समय तक लेखक के मूल्यांकन और आलोचकों के बीच उसकी स्वीकृति तथा प्रतिष्ठा का केंद्रीय आधार रही है। साहित्य जगत को इसका लाभ तो मिला है, पर नुकसान ज्यादा उठाने पडे हैं। आज के बदले संदर्भो में यह कितनी प्रासंगिक है, आइए देखते है कुछ ऐसे वरिष्ठ लेखकों-आलोचकों की नजर से जिनके अपने अनुभव का यह हिस्सा रहा है। क्या लेखक के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता जरूरी है? अगर हां तो क्यों और नहीं तो क्यों? क्या वाद और मूल्य एक ही बात है और क्या वादों से मुक्त होने का अर्थ मूल्यों से भी मुक्त होना है? वैचारिक प्रतिबद्धता की सीमा क्या हो? क्या वैचारिक प्रतिबद्धता लेखकीय स्वतंत्रता को बाधित नहीं करती है? क्या किसी विचारधारा विशेष के प्रति कटिबद्ध होने की स्थिति में लेखक विषयवस्तु के साथ न्याय कर पाता है? क्या राजनेता की तरह लेखक से भी विचारधारा को अपने जीवन में उतारने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए? अगर नहीं तो फिर ऐसी विचारधारा के प्रति कटिबद्धता का अर्थ क्या रह जाता है? राजनीतिक पार्टियों के प्रति लेखकों की प्रतिबद्धता ने साहित्य को किस तरह प्रभावित किया है? वैचारिक प्रतिबद्धता लेखकीय स्वतंत्रता को बाधित करती है: रमेश चंद्र शाह वैचारिक प्रतिबद्धता की मांग का सीधा चालू अर्थ है- किसी खास राजनैतिक दल या मताग्रह की अधीनता स्वीकार कर लेना और अपनी विचार-क्षमता या भाव-क्षमता को उसी के हिसाब से, उसी के निर्देशानुसार अनुकूलित और नियोजित करने को तैयार हो जाना। इस अर्थ में लेखक के लिए वह न केवल कतई जरूरी नहीं है, बल्कि अहितकर भी है। अपनी जीवनानुभूति और स्वर्जित निष्ठा की एकाग्र साधना बिलकुल अलग बात है, जो कबीर, तुलसी, तुकाराम आदि में हम देखते हैं। आज के ठेठ बुद्धिवादी युग में हर बुद्धि-वान इकाई अपने स्वातं˜य की रक्षा करने के लिए स्वभावत: और स्वधर्मत: प्रतिबद्ध होगी। भारत का बुद्धिजीवी यदि वैचारिक स्वराज के लिए कटिबद्ध और सक्रिय नहीं, तो वह बुद्धिजीवी लेखक कहलाने का पात्र भी नहीं। लेखक भी इसी कोटि का जीव है। बल्कि अन्य बुद्धिजीवियों की तुलना में उसकी बुद्धि आदमी की समूची ऐंद्रिक, भाविक और सांवेदनिक सत्ता के भीतर से काम करने के कारण ज्यादा मानवीय, ज्यादा राग संश्लिष्ट और इसीलिए ज्यादा जिम्मेदार होनी चाहिए। तभी वह अपने लोगों का सच्चा गहरा प्रतिनिधि- उनके अंत:करण सरीखा, साबित होता है। महज तथाकथित जनप्रतिनिधि नहीं। वाद और मूल्य सर्वथा अलग चीजें है। नारद का भक्तिसूत्र तक कहता है कि वाद का सहारा लेना व्यर्थ है- वादो नावलम्ब्य:। अब साहित्य में अपनी तरह का ज्ञानयोग और कर्मयोग भी समा सकता है, पर सबसे ज्यादा वह भक्ति योग के निकट की चीज है। चाहे उस भक्ति का अवलंबन अलौकिक शक्ति न होकर सगुण मानव ही क्यों न हो। मनुष्य होश संभालते ही स्वयं को दो महान आश्चर्यो के बीच पाता है : एक तारों भरा आसमान, जो उसे अगणित ग्रह-नक्षत्रों वाले असीम ब्रह्मांड में अपनी नगण्यता का आभास कराता है, दो स्वयं अपने भीतर महसूस होने वाला विराट नैतिक नियम, जिसे प्रख्यात दार्शनिक कांट मॉरल लॉ कहता है। यह दूसरी अनुभूति ही उसे सब कुछ से जुडे होने का यानी अपनी उस सार्थकता का बोध कराती है जिससे उसे अनवरत खुद कमाने और जीने की कोशिश करनी पडती है। भारतीय संस्कृति की शब्दावली में कहें तो हमारी मनुष्यता एक ऋणानुबंध है, जिससे उऋण होने की प्रकिया ही हमें मूल्यान्वेषण में प्रवृत्त करती है। किंतु ये मूल्य भी निरंतर शोध की अपेक्षा रखते हैं। परिवर्तनशील जगत के साथ-साथ वाद-विवाद-संवाद तर्कबुद्धि के विकास के उपकरण हैं। साधनमात्र, साध्य नहीं। साध्य तो मूल्य ही होते हैं। पर इस बात को वही जानते-समझते हैं जो साधन और साध्य की एकता को जानते और स्वीकार करते हैं। साहित्य को राजनीतिक मोर्चाबुद्धि से चलाने की पुण्यासक्ति से प्रेरित लोगों के लिए यह विवेक अप्रासंगिक होगा। प्रसाद का चाणक्य शाश्वत सार्वभौम बुद्धि-वैभव का आदर्श सामने रखता है, यूनानी दार्शनिक अरस्तू यूनिवर्सल इंटेलीजेंस का। लेखन की शुरुआत में, युवाकाल में किसी विचारधारा या मतवाद के प्रति आकर्षण- उसके मानवीय दावों और उपलब्धियों को देखते हुए सहज स्वाभाविक हो सकता है, हालांकि अनिवार्य फिर भी नहीं। किंतु बौद्धिक-भाविक अनुभव परिपक्वता ऐसी प्रतिबद्धता को उसकी एकांगिता और सत्यापघाती परिणतियों से उजागर करती हुई- आवश्यक और निरर्थक बना देती है। वैचारिक प्रतिबद्धता लेखकीय स्वतंत्रता को बाधित ही करती है, इसके प्रमाण सर्वत्र प्रगट हैं। सच्चे कलाकारों को उस मोह से उबरते देर नहीं लगती। मीडियाकर ही उससे चिपटे रहते हैं, क्योंकि उनकी सुरक्षा उसी में उन्हें दिखाई देती है। अपवाद हो सकते हैं। वैचारिक रूप से कटिबद्ध लेखक विषयवस्तु के साथ न्याय एक सीमा तक ही कर सकता है। जब तक कि वह विषयवस्तु को उसकी पूरी गोलाई में, जटिलता और गहराई में ग्रहण कर पाने में समर्थ नहीं होता। ज्यादातर की तो बाढ ही मारी जाती है। वे विषयवस्तु के प्रति क्या, स्वयं अपनी ही बेहतर समझदारी के क्षणों के प्रति, स्वयं अपने ही विवेक और संवेदनशक्ति की खुली संभावनाओं के प्रति न्याय नहीं कर पाते। कटु सत्य यह भी कि वे अपनी ही अंतरात्मा के लिए अगम्य-अवध्य-अवेध्य हो जा सकते हैं, हुए ही हैं। इसी कारण वे अपने समानधर्माओं के प्रति भी अन्याय-द्रोह और कुत्सा-अवज्ञा का रुख अपनाने को अभिशप्त हो जाते हैं। ऐसे उदाहरण हमारे सामने उजागर हैं। लेखक से उसकी विचारधारा को जीवन में उतारने की अपेक्षा निश्चय ही की जानी चाहिए। यह ठीक है कि मनुष्य सदैव अपने आदर्श से न्यून रहता है। पर विचारधारा आदर्श नहीं है। वह सत्य की एक तंग व्याख्या का उसके अनुसार पूर्वनिधार्रित वांछित परिणाम प्राप्त करने का दावा है और उसके लिए एक बंधी लीक पर चलने चलाने की अहंकारविमूढ जिद। राजनीतिक पार्टियों से जुडाव के अनिष्ट प्रभाव ही अधिक उजागर हैं। अपवादस्वरूप कुछ अच्छे उदाहरण गिनाने से बात नहीं बनती। शोधी जीवन और कर्म-विचार से गहरे संवेदित कई लेखकों ने उत्कृष्ट रचना की है। उन्हें गांधीवादी या समाजवादी कहा जा सकता है। पर गांधी स्वयं गांधीवाद जैसी चीज को नकारते हैं। जैसे जैनेंद्र कुमार ने तथा अपने विकासक्रम के किन्हीं सोपानों पर और भी कई लेखकों ने, जिनमें गुप्तजी, पंतजी, विष्णु प्रभाकर आदि कई लेखक होंगे। पर वे राजनीतिक पार्टी से प्रतिबद्ध तो नहीं कहे जा सकते। स्वतंत्रता संग्रामी कांग्रेस से जुडे नवीन, माखन लाल चतुर्वेदी आदि लेखक भी थे। लेखक के लिए सार्वजनिक जीवन या संस्पर्श आवश्यक हो सकता है किन्हीं अवसरों पर। अल्पकालिक जुडाव या प्रतिबद्धता भी प्रेरणा दे सकती है, उसकी मानवीय संवेदना को बल पहुंचा सकती है। राजनीति से सर्वथा उदासीन आज कोई लेखक नहीं रह सकता। पर वह किसी एक पार्टी को अपना नियामक बना ले, उसका अनुशासन स्वीकार कर ले, ऐसा नहीं होगा। कुछ समय के लिए उसमें यह मुगालता पनप सकता है कि यह पार्टी मेरे अभिलिखित मूल्यों को आगे बढाने वाली है और उसको मेरा आत्मदान मेरी अपनी शर्तो पर संभव है। शायद श्रीकांत वर्मा सरीखे कुछ लेखकों के साथ इस तरह की बात रही हो। पर उनके मोहभंग का गद्य और काव्य दोनों साबित करते हैं कि उनका निर्णय बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं था। हां, समाजवादियों में जरूर सबसे ज्यादा ऐसे लोग हुए, जिनकी कथनी-करनी में सामंजस्य था। गांधी से उनका जुडाव मा‌र्क्सवाद के उन पर प्रभाव को संतुलित करता था। अपनी तरह के मौलिक चिंतक भी उनमें उपजे ही। साथ ही चूंकि वे कम्युनिस्ट पार्टियों की तरह साहित्य को हथियार भर नहीं मानते थे व्यक्ति की और स्वयं साहित्य की स्वायत्त गारिमा का भरपूर आदर करते थे, इसलिए समाजवादी विचारों से प्रेरित प्रभावित कई प्रतिभाशाली लेखकों का उदाहरण हमारे सामने है जिन्होंने साहित्य को साहित्य के हित में प्रभावित किया। मा‌र्क्सवादी लेखकों में भी कई हैं जिनका साहित्य योगदान असंदिग्ध है।

विचारों के बिना किसी साहित्यिक कृति की रचना संभव नहीं: प्रो. गुरदयाल सिंह वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक हो या न हो, इसकी कोई सीमा भी हो या न हो, या ऐसी प्रतिबद्धता लेखक की स्वतंत्रता को बाधित करती हो या न करती हो, परंतु विचारों के बिना किसी साहित्यिक कृति की रचना संभव नहीं। यदि आपका प्रश्न किसी विशेष विचारधारा से प्रतिबद्ध होने को लेकर है तो यह अलग बात है। जहां तक लेखक की स्वतंत्रता का प्रश्न है, यह स्वतंत्रता शब्द ही भ्रामक है। जब तक किसी भी रूप में राज्य तथा समाज व्यवस्था कायम रहेगी तब तक पूर्ण स्वतंत्रता संभव नहीं है। यदि लेखक किसी भी विचारधारा से मुक्त होकर कुछ लिखना चाहे तो वह किसी सार्थक कृति की रचना नहीं कर पाएगा। इससे भी आगे यदि लेखक सभी विचारधाराओं, विचारों, भावनाओं को ताक पर रखकर कुछ लिखेगा तो वह केवल अराजकता होगी जो किसी भी समाज के लिए घातक सिद्ध होगी।    वाद के आम अर्थ सिद्धांत ही माने जाते हैं। अभी तक कोई सिद्धांत ऐसा नहीं जो किन्हीं मूल्यों पर आधारित न हो। किसी भी सिद्धांत का स्वरूप बडे दार्शनिक चिंतक ही निश्चित करते हैं जो उनके विचारों तथा मूल्यों पर आधारित होता है। कोई लेखक एक या दूसरे वाद से प्रभावित होकर कुछ लिखेगा तो उस वाद के विचारों या मूल्यों से कैसे मुक्त हो पाएगा? वाद, विचार तथा मूल्य एक ही बात हो या न हो परंतु मानवीय मूल्यों तथा विचारों के बिना किसी भी साहित्यिक कृति का सार्थक तथा श्रेष्ठ होना संभव नहीं।    विषयवस्तु से न्याय कर पाने या न कर पाने की समस्या का संबंध लेखक की प्रतिभा से रहता है। इस मामले में विचारधारा से प्रतिबद्ध होना या न होना इतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता। साधारण लेखक किसी विचारधारा से प्रतिबद्ध न होकर भी विषयवस्तु के साथ न्याय नहीं कर पाएगा और प्रतिभाशाली लेखक प्रतिबद्ध होते हुए भी न्याय कर सकता है। यहां पाबलो नेरूदा जैसे अनेक लेखकों के उदाहरण देकर इस बात को सिद्ध किया जा सकता है।    अरे भाई यह क्या उलटी गंगा बहाने लगे। .. भला किसी राजनेता ने भी कभी किसी विचारधारा को अपने जीवन में उतारा है? कम से कम भारत के राजनेताओं में तो शायद कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो अपनी तो क्या किसी भी विचारधारा को अपने जीवन में उतार पाए। हां लेखक अवश्य कुछ ऐसे मिल जाएंगे जिन्होंने अपनी विचारधारा को अपने जीवन में उतारा हो। परंतु आज के युग में तो शायद वे भी मुश्किल से मिलेंगे। कोई भी व्यक्ति समाज की मुख्यधारा के प्रभाव से नहीं बच पाता। जब बाजार व्यवस्था में सभी कुछ बिकाऊ है तो साहित्य भी इस व्यवस्था से कैसे बच पाएगा? परंतु फिर भी ऐसे कितने प्रतिभाशाली लेखक मौजूद हैं जो आज भी बहुत अच्छा लिख रहे हैं।    यह बात भी अवश्य समझ लें कि किसी भी श्रेष्ठ कृति की रचना, विचारधारा को अपने अंदर उतारे बिना संभव नहीं। यदि कोई लेखक ऐसा नहीं कर पाता यानी मन और, मुख और है तो वह कभी भी श्रेष्ठ नहीं होगा। यह प्रतिभाशाली बडे लेखक ही हैं जो भ्रष्ट समाज में भी मानवीय गुणों तथा मूल्यों को बचाए रखते हैं। भारतीय समाज को यही लोग बचा पाएंगे और इनकी संख्या अवश्य बढती जाएगी, क्योंकि कोई भी समाज सदा भ्रष्ट नहीं रह पाता, नहीं तो उसका अस्तित्व ही नहीं रह पाएगा।    श्रेष्ठ साहित्य का राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता से कोई सीधा संबंध कभी नहीं रहा। रूस के सुप्रसिद्ध लेखक मैक्सिम गोर्की ने राजनीतिक पार्टी से प्रतिबद्ध रहते हुए केवल एक उपन्यास मां लिखा, परंतु उसमें भी श्रेष्ठ साहित्य के मापदंडों पर राजनीति को हावी नहीं होने दिया। जो लेखक किसी राजनीतिक पार्टी से प्रतिबद्ध होते हुए साहित्य की मूल आवश्यकताओं, मापदंडों का ध्यान नहीं रख पाते वे पार्टियों के मैनिफेस्टो ही लिख सकते हैं, साहित्य की रचना नहीं कर पाते। श्रेष्ठ साहित्य की रचना की कुछ मूलभूत शर्ते होती हैं जिन्हें हमेशा ध्यान में रखना होता है। तभी कोई लेखक, किसी राजनीतिक पार्टी से प्रतिबद्ध रहते भी कुछ लिख सकता है। यहां यशपाल के बहुत सुंदर उपन्यास दिव्या के उदाहरण से इस समस्या को समझा जा सकता है। इसके अलावा झूठा-सच की मिसाल भी दी जा सकती है।   

वैचारिक प्रतिबद्धता से कालजयी साहित्य का सृजन असंभव: राजेंद्र अरुण वैचारिक प्रतिबद्धता का अर्थ यदि संकुचित रूप में किसी मतवाद के प्रति आह्वान होना है, तो यह लेखक के लिए योग्य नहीं। मतवादी प्रतिबद्धता जीवन-नद के प्रबल प्रवाह के लिए बांध का काम करती है। मतवादी प्रतिबद्धता से प्रसूत लेखन या तो आदर्श के नाम पर उपदेश बन जाता है या यथार्थ के नाम पर शुष्क एवं वितृष्ण वस्तुस्थिति का अंकन। ऐसे लेखन से वाद भले ही परिपुष्ट हो, पर साहित्य दुर्बल एवं अल्पजीवी बनता है।    वाद और मूल्य एक नहीं हैं। वाद जीवन को जानने, समझने और नियमित करने का एक दृष्टिकोण है, मूल्य जीवन को संपूर्णता में परिभाषित करने का एक शुभ संकल्प है। वाद स्वयं अपने को प्रतिष्ठित करने के लिए हठवान होता है पर मूल्य जीवन में शुभ के अवतरण का मार्ग प्रदान करता है। वाद जीवन-प्रवाह को बांधकर उथला एवं संकीर्ण बनाते हैं, जबकि मूल्य तट बनकर उसे और गहन एवं प्राणवान बनाते हैं। वाद से मुक्त होना मूल्य से मुक्त होना नहीं है। वाद जीवन को उद्वेलित करके लक्ष्यसिद्धि का द्वार खोलता है, जबकि मूल्य जीवन को शांत-सृजन के सहारे शुभ स्वरूप प्रदान करता है। वाद का आग्रह मिट जाने पर जीवन से मूल्य नहीं मिटता है। वास्तव में वादयुक्त मूल्य जीवन को संकुचित और वादरहित मूल्य जीवन को विराट बनाते हैं। हर मत जीवन में कुछ सुनिश्चित मूल्यों की प्रतिष्ठा का संकल्प होता है लेकिन मतवाद की संकीर्णता में फंसकर मूल्य अपनी गरिमा खो बैठता है। इसीलिए प्रतिबद्ध साहित्य प्राय: मतवाद के घोषणापत्र बनकर रह जाते हैं। उनमें जीवन की तरलता नहीं रह जाती।  स्वतंत्रता यदि अराजक स्वच्छंदता नहीं है तो लेखक को कहीं न कहीं तो बंधना ही होगा। यदि उसे वैचारिक प्रतिबद्धता बांधती है तो कालजयी साहित्य का सृजन नहीं हो सकेगा, लेकिन यदि लेखक मूल्य से बंधता है तो मानव मन का गहन चितेरा बनता है। वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध लेखक चिंतन के सर्वस्पर्शी विराट स्वरूप को खो देता है।    विचारधारा के प्रति आग्रहवान होने का सबसे बडा दोष यही है कि लेखक विषयवस्तु के साथ न्याय नहीं कर पाता है। लेखक अपने मताग्रह के अनुसार जब समस्त जीवन व्यापार को व्याख्यायित करता है तो वह अराजक और हठधर्मी बन जाता है। वह दृष्टि के अनुसार सृष्टि का निर्माण करता है, जबकि होना यह चाहिए कि सृष्टि का आभ्यंतर आकलन करके दृष्टि का निर्धारण किया जाए। मतवादी लेखक कभी विषयवस्तु के साथ मानवीय संवेदनापूर्वक न्याय नहीं कर पाता है। उसे मानव चित्त की नहीं अपने मतवादी चित्त की सदैव चिंता रहती है। इसीलिए मतवादी साहित्य के चरित्र और उनमें गुंथे हुए विषयवस्तु कृत्रिम लगते हैं, उनमें जीवन का सहज प्रवाह नहीं होता है।    मतवादी लेखक किसी राजनीतिक विचारधारा से मानसिक रूप से प्रभावित होता है। उसके लिए दल विशेष का कार्ड होल्डर या एक्टिविस्ट होना आवश्यक नहीं है। लेखक अपने सृजन में चरित्रों को रूपायित करता है। उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि खलनायक को चित्रित करने के लिए वह खलनायक बन जाए या गरीबी के चित्रण के लिए फटेहाल बन जाए। संवेदना ही लेखक की सबसे बडी शक्ति है। लेखक जब प्रतिबद्ध होता है तो उसकी संवेदना अपनी तरलता खो देती है लेकिन निश्चित रूप से वह पाठकों तक अपने मतवादी विचार को संप्रेषित करती है। मेरी समझ से लेखक की प्रतिबद्धता का इतना ही अर्थ है कि वह अपने सृजन में चरित्रों को अपने मतवाद की सीमा रेखा में बांधता है और उसे ही शुभ एवं श्रेयस्कर समझता है।    राजनीतिक दलों के प्रति प्रतिबद्ध लेखक बौने हो जाते हैं। उनके साहित्य से कभी जीवन के विराट का प्रस्फुरण नहीं हो सकता। राजनीतिक दल वोट की राजनीति करते हैं, अपने हित साधन के लिए कोई भी जोड-तोड करना उनके लिए मान्य और नैतिक होता है। लेखक दलगत राजनीति से जुडकर कुछ सुविधाएं या वाहवाही भले ही प्राप्त कर ले लेखक की समर्थता नहीं प्राप्त कर सकेगा। मैं यह निश्चित रूप से मानता हूं कि महान लोग महान विचारधारा और महान संगठन को जन्म देते हैं, पर कोई विचारधारा या संगठन चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो, महान व्यक्तियों को निश्चित रूप से पैदा नहीं कर सकता।    लेखक जब भी दलगत राजनीति से प्रभावित होगा साहित्य की संवेदना कुंद होगी। लेखक पोलिटिकल एजेंट और साहित्य पोस्टर बन जाएगा। सच कहा जाए, तो साहित्य की उर्वर भूमि में संवेदना ही बीज होती है, विचार तो पुष्प और फल हैं। विचारधारा से प्रतिबद्ध लेखक इस क्रम को उलट देता है। इसीलिए प्रतिबद्ध साहित्य हृदय को सहलाने-दुलारने के बजाय उसे कुरेदने में अधिक रुचि लेता है। परिणामत: साहित्य अपने सहज स्वभाव को तिलांजलि दे देता है।   

लेखक की जरूरत विचार है, थोपी हुई विचारधारा नहीं: प्रभाकर श्रोत्रिय  विचार और विचारधारा दोनों दो अलग-अलग बातें हैं। जहां तक प्रश्न विचार का है, उससे तो लेखक प्रतिबद्ध रहता ही है, पर लेखक को यह प्रतिबद्धता दिखाने की कोई जरूरत नहीं होती है। जिन विचारों को उसने लिया है, उन पर दृढ रहना उसकी भीतरी जरूरत है। बिना विचार के लेखन संभव नहीं है लेकिन लेखक की जरूरत विचार है, थोपी हुई विचारधारा नहीं। किसी विचार को लेखक यदि स्वयं चुनता है तो उसका एकांगी अर्थ नहीं होता। इसके विपरीत यदि वह किसी तरह के दबाव या लोभ में किसी विचारधारा को स्वीकारता है और उसके अनुरूप रचना करता है तो उसकी रचना अपनी सार्थकता खो देती है। विचारधारा जब बनती है तो वह मूल्यों पर ही आधारित होती है, लेकिन उसमें समय के साथ परिवर्तन या विकास की क्षमता न होने के कारण बाद में वह अपनी गतिशीलता खो देती है। यह अलग बात है कि किसी की मूल्यों की प्रणाली अलग हो। सभी धर्म भी मूल्यों पर ही आधारित हैं। लेकिन सभी एक नियत अवधि के बाद जडता के शिकार हो जाते हैं और जब जडता आ जाती है तो वे निहित अर्थो में इस्तेमाल होने लगते हैं। फिर विचारधारा हो या धर्म, वहां केवल पाखंड बचता है।    प्रतिबद्धता चूंकि आंतरिक बात है, अत: यह लेखक की आत्मा का स्वर है। वह जकडन नहीं है। लेकिन जब हम किसी चीज को ऊपर से लादते हैं तो वह जकडन बन जाती है। उसमें गतिशीलता नहीं रह जाती और हम रूढिबद्ध हो जाते हैं। हमारे यहां कहा गया है- निरंकुशा कवय: अर्थात कवि निरंकुश होता है, पर इनके भीतर अनेक बंधन होते हैं। ये बंधन हैं परंपरा के, अपने पूर्ववर्ती मनीषियों के विचारों के, अपने समय की जरूरत के और कई तरह के बंधन होते हैं। उसके भीतर निरंतर रस्साकशी चलती रहती है। इस प्रक्रिया में वह विचार वही लेता है जो उसके भीतर से आता है और स्वेच्छा से ली हुई चीज बंधन नहीं है। वह अंकुश स्वीकार नहीं करता और इसीलिए सर्जना के नए उद्भव की घोषणा करता है।    यदि कोई विचारधारा अपने को समय और परिस्थिति से अनुकूलित नहीं कर पाती है तो वह अपनी अर्थवत्ता और सर्जनात्मकता खो देती है। परिप्रेक्ष्य को सीमित कर देती है। यदि यह दृष्टिकोण लेखक की अपनी सोच और उत्प्रेरण से पैदा हो तब तो वह उसका निजी अवदान है, लेकिन अगर विचारधारा की रूढि से आए तो वह विषयवस्तु को सीमित और एकांगी बना देता है। पिछलग्गू बनाता है। ऐसी स्थिति में लेखक विषयवस्तु के साथ न्याय कर ही नहीं पाता है।    लेखक से यह अपेक्षा की ही जानी चाहिए कि वह जिस विचारधारा का वरण कर रहा है उस पर स्वयं अमल करके दिखाए। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है तो यह चीज विचारधारा को भी कटघरे में खडी करती है। यदि आप दूसरों के लिए कोई मूल्य रचते हैं और स्वयं उस अमल नहीं कर पाते तो यह स्थिति आपकी सर्जना को खोखला बनाती है। विचारधारात्मक साहित्य इतना पुष्ट क्यों नहीं होता है? क्योंकि विचारधारा जब हमारे व्यक्तित्व में ढली नहीं होती तो वह हमारी सर्जनात्मक अनुभूति में नहीं बदलती। यह केवल शिल्प का दिखावा होता है। इसमें कोई विश्वसनीयता और ताकत नहीं होती।   

विचार के साथ ही रचनाधर्मिता विकसित होती है: मोहनदास नैमिशराय  मानव समाज में वैचारिक प्रतिबद्धता का होना जरूरी है। विशेष रूप से लेखक के लिए तो यह और भी जरूरी है, क्योंकि किसी देश, किसी समाज या किसी महापुरुष के लिए आस्था और विश्वास होने पर ही सामाजिक न्याय का दर्शन आगे बढता है और जब लेखक कुछ लिखता है तो उसके माध्यम से ही संबंधित विचार आगे बढते हैं। वह जन-जन के बीच में पढा जाता है। इसका एक कारण यह भी होता है कि पाठकवर्ग किसी लेखक को एक खास तरह से पढना चाहता है। वाद और मूल्य एक ही बात नहीं है। वादों से मुक्त होने का अर्थ मूल्यों से मुक्त होना कदापि नहीं है। मूल्य हमारे सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में आते हैं। मूल्यों का संबंध मनुष्य के सभी पहलुओं से है। मूल्य ही मनुष्य को मनुष्यता के सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में प्रयोग करने की ऊर्जा देते हैं।    वैचारिक प्रतिबद्धता की कोई सीमा नहीं है। साथ ही वैचारिक प्रतिबद्धता लेखकीय स्वतंत्रता को बाधित नहीं करती। वैसे विचार में कट्टरता लेखकीय स्वतंत्रता को अवश्य ही बाधित करती है। क्योंकि विचार रूढ नहीं होने चाहिए। विचार रूढ होने पर विचार नहीं रहता, बल्कि रूढियों में परिवर्तित हो जाता है।    विचारधारा के प्रति कटिबद्ध होने की स्थिति में लेखक विषयवस्तु के साथ न्याय नहीं कर पाता है, ऐसी बात नहीं है। इसमें हमें देखना यह चाहिए कि किस विचार को एक लेखक अपनी किस भाषा में जनता तक पहुंचा रहा है? उसका लिखने का तरीका क्या है? शब्दों के साथ उसके विश्लेषण की शैली कौन सी है? कहीं वह अपने विचार थोप तो नहीं रहा है? पाठकों की भावनाओं को उद्वेलित तो नहीं कर रहा है? इस बारे में इन सभी बातों का महत्व है। मेरी राय में लेखक जिस किसी भी विषयवस्तु का चुनाव अपनी रचना के लिए करता है, उसका एक उद्देश्य होता है। उसके साथ कोई विचारविशेष भी होता है। वैसे विचार के साथ ही रचनाधर्मिता विकसित होती है।    लेखक से विचारधारा को अपने जीवन में उतारने की अपेक्षा की ही जानी चाहिए। इसलिए कि राजनेता सिर्फ राजनेता है और लेखक केवल लेखक नहीं है। बल्कि लेखक के साथ वह और भी बहुत कुछ होता है। लेखक का समाज के प्रति उत्तरदायित्व होता है जिसे वह अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से पूरा करता है। वह पाठकों तक खास उद्देश्य की पूर्ति के लिए पहुंचता है। पाठक भी किसी लेखक को इसीलिए पढते हैं कि वह उनके लिए एक प्रतीक होता है, कुछ विशेष कार्यो और उनके पूरा होने की अभिलाषाओं का। पाठक एक लेखक के व्यक्तित्व में उसके विचारों को मूर्त होते देखना चाहते हैं। कोई भी विचार समय की कसौटी पर कसा जाता है। विचार अगर रूढ है और समय आगे बढ रहा है तो उस विचार का क्या फायदा। रुका हुआ पानी सड जाता है और जब पानी सड जाता है तो नुकसानदेह होता है। विचार बहते हुए पानी की तरह होना चाहिए।    राजनीतिक पार्टियों के प्रति लेखकों की प्रतिबद्धता ने साहित्य को बहुत सीमा तक प्रभावित किया है। कोई भी राजनीतिक विचार लेखक के लिए इकरारनामा नहीं है और न ही किसी पार्टीप्रमुख को खुश करने का साधन। राजनीति ने मानव समाज को जहां प्रभावित किया है, वहीं लेखक भी उससे बचा नहीं रह सका है। लेखक पर होने वाले बहुत सारे प्रभावों के बारे में पाठक जानते और समझते रहे हैं। निश्चित ही राजनैतिक पार्टियों ने लेखकों की नई जमात बना ली है। जिससे राजनैतिक घोषणापत्र पाठकों तक पहुंचने लगे हैं। बहुत सारे लेखक भी राजनीति की धारा में बह चुके हैं। इसे उनकी प्रतिबद्धता कहें या वचनबद्धता, लेकिन लेखक पहले एक व्यक्ति होता है, बाद में कुछ और। लेखक को व्यक्ति बनकर ही रचनाधर्मिता का निर्वाह करना चाहिए।   

लेखक को वैचारिक रूप से स्वतंत्र होना चाहिए: डॉ. हरिकृष्ण देवसरे मेरी दृष्टि में लेखक के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता कतई जरूरी नहीं है। लेखक के लिए जरूरी तो यह है कि वह वैचारिक रूप से स्वतंत्र हो। यदि लेखक स्वतंत्र नहीं है तो उसका चिंतन भी मौलिक नहीं हो सकता। प्रतिबद्धता का अर्थ तो गुलामी है। यदि लेखक किसी वाद या राजनीतिक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध है तो इसका अर्थ है कि वह न तो विचारों में स्वतंत्र है और न ही अपनी रचनाधर्मिता में मौलिक है। सीधे-सीधे कहें तो वह किसी वाद या राजनीतिक विचारधारा का बिगुलवादक बनकर रह जाता है। यही स्थिति वाद और मूल्यों की है। जब लेखक किसी वाद से प्रभावित होता है तो वह मूल्यों को भी उसी के अनुरूप परिभाषित करने का प्रयत्न करता है। इसमें कई बार सामाजिक संघर्ष भी होता है। किंतु स्वतंत्र लेखक समाज के बदले परिप्रेक्ष्य में मूल्यों का आकलन करके, समाज के सामने उसके हित-अहित का विश्लेषण करके, अपना सामाजिक दायित्व भी पूरा करता है। प्रतिबद्ध लेखक समाज को अपनी राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप ढालने की कोशिश में जुटा रहता है। उसके सामने समाज का बनना-संवरना उसकी राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप होना ही कहलाता है।    जो लेखक प्रतिबद्ध है, उसकी कलम स्वतंत्र कैसे हो सकती है? यदि वह स्वतंत्र होकर कुछ लिखेगा तो उसे उसके वाद या राजनीतिक दल के विरुद्ध माना जाएगा। इससे इतर उसके दल के लोग उसे अपना समर्थन क्यों देंगे। आज साहित्य में जो गुट बने हुए हैं, उनमें बंधे लेखकों को जो लाभ मिलता है वह यही है कि वे आपस में एक-दूसरे की प्रशंसा करते हैं, पुरस्कारों की बांट होती है, पाठयक्रमों में रचनाएं और पुस्तकें शामिल की जाती हैं। हमारी शिक्षा नीति में यही तमाशा होता रहता है। एक दल प्रभाव में होता है तो पाठयक्रम में शामिल इतिहास और साहित्य की पुस्तकें कुछ और कहती हैं, दूसरा दल प्रभावी होता है तो कुछ और कहने लगती हैं। ये सब प्रतिबद्धता के ही दुष्परिणाम हैं कि इतिहास का एक सच, अलग-अलग राजनीतिक चश्मों से देखकर व्याख्यायित होता है और पाठक भ्रमित होते रहते हैं कि वास्तव में सच क्या है। निश्चित ही प्रतिबद्ध लेखक किसी भी विषयवस्तु के साथ न्याय नहीं कर पाता-क्योंकि वह उसे अपनी सोच या वाद के अनुरूप तोडकर व्याख्यायित करने के लिए विवश होता है। उसकी यह विवशता धीरे-धीरे उसे संवेदनहीन बना देती है। तब लेखक, जिसका मूलभूत गुण संवेदनशील होना ही है, प्रतिबद्ध होकर विषयवस्तु या समाज की जिन घटनाओं को अपनी कहानी या कविता का विषय बनाता है, उनके प्रति संवेदनशील कैसे हो सकता है? वह तो उनके प्रति अपने वाद या राजनीतिक संगठन द्वारा दी गई संवेदना की परिभाषा के तहत ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा? ऐसी स्थिति में उसकी रचना में वस्तुस्थिति के प्रति न्याय नहीं हो सकता है।    आज चाहे किसी भी दल या वाद के लोग हों, इन सबके दोहरे चेहरे होते हैं। ये जैसा दिखते हैं या जैसा होने की बात करते हैं, वैसे बिलकुल नहीं होते। पर्दे के पीछे या निजी जीवन में ये एकदम भिन्न होते हैं। इसलिए इनसे जुडे लेखक भी कहने को प्रतिबद्ध होते हैं। लेखक अपनी रचना में जिन मूल्यों को स्थापित करता है, उसका आचरण उनसे एकदम अलग होता है। ऐसी स्थिति में उसकी प्रतिबद्धता मात्र छलावा बन कर रह जाती है। राजनेता की तरह ही लेखक भी ऊपर से प्रतिबद्ध और अंदर से कुटिल होता है। चाहे कोई एक उदाहरण ले लीजिए। हांडी का हर चावल ऐसा ही मिलेगा।    मैं समझता हूं कि कबीर, सूर या तुलसी जो कालजयी हो सके उसका सबसे कारण यही है कि वह किसी वाद या विचारधारा विशेष से प्रतिबद्ध नहीं थे। उनकी प्रतिबद्धता जीवन के उदात्त मूल्यों से थी, न कि किसी राजनीतिक संगठन या सत्ता से। बाद के भी जिन लेखकों-कवियों को आमजन याद रख पाता है, वे वही हैं जिनकी प्रतिबद्धता वादों से न होकर मूल्यों के प्रति रही है। मुंशी प्रेमचंद, निराला या प्रसाद ने जो भी लिखा, उन्होंने एकदम स्वतंत्र, निर्भीक और अत्यंत संवेदनशील होकर लिखा। इसीलिए इनकी रचनाओं में अपनी माटी की महक है और जीवन का वास्तविक तथा पूर्ण विश्वसनीय स्पंदन है। इसके विपरीत जिन लेखकों की प्रतिबद्धता सत्ता या किसी अन्य संगठन से हुई उनका अधिकांश लेखन केवल प्रचार साहित्य होकर रह गया। राजनीतिक विचारधारा या वादों के बंधनों में जो रचनाएं लिखी जाती हैं, वे उसका प्रचार साहित्य ही कहलाएंगी। उन्हें लेखक की स्वतंत्र या मौलिक रचना तो नहीं ही कहा जा सकता और न ही वह जनमानस में लोकप्रिय हो सकती। मेरी समझ से तो प्रतिबद्ध लेखक होने से अच्छा तो लेखक न होना ही है। ईसप भी गुलाम था। लेकिन जब मुक्त हुआ तो अपने स्वतंत्र जीवनकाल में विश्व को ईसप की कहानियां जैसी कालजयी कृति दे गया।   

सार्थक रचना हमेशा परिवर्तन की पैरोकार होती है: राजेन्द्र राव वैचारिक प्रतिबद्धता का अर्थ अकसर पार्टी लाइन अपनाने की अनिवार्यता के रूप में निरूपित किया जाता है। ऐसे में विचारधारा की सीमा ही लेखन की सीमा बन जाती है तब लेखकीय स्वतंत्रता कोई मायने नहीं रखती। सच तो यह है कि लेखक की कल्पनाशीलता को सशक्त से सशक्त विचारधारा के पिंजडे में भी कैद नहीं किया जा सकता मगर पिंजरे में रहने का अपना सुख है।    कटिबद्ध होना यदि प्रतिबद्ध होने से आगे की अवस्था है तो यह निश्चित है कि इससे विषयवस्तु का चुनाव भी सीमित हो जाएगा। ऐसे लेखक के पास एक आग्रहपूर्ण संदेश होता है। वह ऐसे कथ्य को चुनेगा जो उस संदेश को वहन कर सकता हो। वैसे भी लेखकीय न्याय (पोएटिक जस्टिस) को पाठक कुछ अलग दृष्टि से देखते हैं।    विचारधारा को जीवन में उतारने की बात एक सैद्धांतिक परिकल्पना है। आप भारतीय राजनीति के परिदृश्य को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि विचारधारा की जरूरत संगठन बनाने के लिए तो होती है परंतु प्रखर व्यक्ति अंततोगत्वा विचारधारा पर हावी हो जाते हैं। सच यही है कि गतिशील न होने पर विचारधारा पंथप्रमुख का वाहन बनकर रह जाती है। ऐसे में लेखक से विचारधारा को जीवन में उतारने की अपेक्षा करना मेरे विचार से ज्यादती है। वह एक अच्छा इंसान हो यही पर्याप्त होना चाहिए।   

Previous 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | Next <

Published in: on सितम्बर 14, 2007 at 5:16 अपराह्न  टिप्पणी करे  

The URI to TrackBack this entry is: https://choupal.wordpress.com/2007/09/14/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%a4/trackback/

RSS feed for comments on this post.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: