काकली संगीत संस्‍था

latest-mp3-065.jpgदोपहर के रागों की महफिल सजी

भोपाल :रविवार दिनांक 27 जनवरी 2008 की दोपहर कला अकादमी के हाल में दोपहर के रागों की महफिल सजाई गई।काकली संगीत संस्‍था व्‍दारा आयोजित इस महफिल का आगाज नरेन्‍द्र सोनी के बांसुरी वादन से प्रारंभ हुआ।उन्‍होने बांसुरी पर राग भीम पलासी बजाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्‍ध कर दिया। साथ ही उन्‍होने वसंत ऋतु के राग बहार में एक गत और सुनाई।तबले पर अखिलेश बुधेलिया ने संगत दी ।  

      संगीत सभा के व्दितीय कलाकार किराना घराने के जावेद उस्‍मानी थे।जावेद ने राग मुलतानी में विलंबित तीन ताल में बडे खयाल से अपना गायन प्रारंभ किया,जिसकी बंदीश थी– गोकुल गॉंव के छोरा,बरसाने की नार। जावेद उस्‍मानी ने दो छोटे खयाल में — कंगन मुदरिया मोरी रे, पेश की। इतना ही नहीं उन्‍होने राग पूरिया,राग पहाडी में ठुमरी सुनाई।तबले पर हेमंत निगडीकर,वायलीन पर किरण कुमार और हारमोनियम पर जितेन्‍द्र शर्मा ने संगत की ।

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Published in: on जनवरी 28, 2008 at 2:06 अपराह्न  टिप्पणी करे  

ओमप्रकाश मेहरा का कहानी पाठ

 निरन्‍तर    

  मध्‍य प्रदेश साहित्‍य अकादमी व्‍दारा दिनांक: 27 जनवरी 2008 को स्‍वराज भवन,भोपाल में आयोजित मासिक गोष्‍ठी निरन्‍तर के अन्‍तर्गत प्रो धनजय वर्मा की अध्‍यक्षाता में कहानीकार एवं कवि ओमप्रकरश मेहरा के कहानी पाठ का आयोजन किया गया । ओमप्रकाश मेहरा ने अपनी दो कहानियों का का पाठ किया । कहानीपाठ के बाद कार्यक्रम की अध्‍यक्षता कर रहे प्रो धनंजय वर्मा व्‍दारा ओमप्रकाश मेहरा के गजल संग्रह का विमोचन किया । श्री मेहरा व्‍दारा उनके गजल संग्रह से दो गजलों का भी पाठ किया गया ।    

      श्री ओमप्रकाश मेहरा प्रशासकीय सेवा से सेवानिवृत्‍त अधिकारी है। प्रशासकीय अधिकारी होने की अवधि में भी वे लेखन में सक्रीय रहे। इतना ही नहीं उन्‍होने अपनी पत्‍नी की स्‍मृति में,जो उनकी प्रेरणा स्रोत रही, बहुत उल्‍लेखनीय लेखन करते रहे। वे एक प्रशासकीय अधिकारी होने की अवधि में भी उतने ही संवेदनशील रहे जितना वे सेवानिवृत्‍त के बाद भी है।    

           उनकी कहानियॉं और कविताएं पढने से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्‍होने जीवन को बहुत करीब से देखा है। जीवन दर्शन उनकी दृष्टि से ओछल नहीं हुआ है बल्कि उन्‍होने उसे बहुत अच्‍छी तरह से न केवल पकडा है अपितु उसे जाना और समझा है। यही कारण है कि उनकी कहानियों और कहानियों में गहरा जीवन दर्शन देखने को मिलता है। उनकी कहानी ‘”उसका तिरंगा एक ऐसे ही बालक की कहानी है जो इतना जोशिला है कि वह गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगा लेकर कार्यक्रम स्‍थल पर दौड पडता है। यह गण है जो तंत्र को समझने की कोशिश तो करता ही है साथ ही अपनी स्‍वतंत्रता को भी दर्शाता है। बालक , गण का प्रतीक है जो समूचे भारतियों का प्रतिनिधित्‍व करता है। वह देश की स्‍वतंत्रता के प्रति इतना उत्‍साहित है कि वह अपनी आवाज उच्‍चस्‍तर पर बैठे लोगों तक पहुँचाना चाहता है किन्‍तु उच्‍चस्‍तर पर बैठे लोग गण को उतना महत्‍व नहीं देते जितना महत्‍व वे तंत्र को देते है। प्रो धनंजय वर्मा ने ठीक ही कहा कि पंडालों में बैठे प्रशासकीय लोगों और नेताओं के लिए यह गणतंत्र नहीं है बल्कि यह गणतंत्र गणों के लिए है, जनता के लिए है।गणतंत्र का महत्‍व जनता के लिए है। जनतंत्र के कारण ही गणतंत्र का निर्माण हुआ है।      गुरूवर विजयबहादुरसिंह ने कहा ,ओमप्रकाश मेहरा की चिन्‍ता जितनी प्रशासकीय अधिकारी रहते हुए थी उतनी चिन्‍ता उनकी आज भी है। उन्‍होने प्रशासकीय पद पर रहते हुए जो  अनुभव प्राप्‍त किए उसका पूरा उपयोग वे आज अपनी लेखनी में कर रहे है जो स्‍तुत्‍य ही है।         

   साहित्‍य अकादमी के निदेशक डा देवेन्‍द्र दीपक व्‍दारा कार्यक्रम का संचालन किया गया। डा देवेन्‍द्र दीपक ने कहा, ओमप्रकाश मेहरा की दृष्टि न केवल प्रशंसनीय है बल्कि कहानी के शिल्‍प पर उनकी पकड भी उल्‍लेखनीय है। वे आज के परिप्रेक्ष्‍य को अपनी लेखनी के माध्‍यम से प्रस्‍तुत करने में पूर्णत: सक्षम है।       

     ठसाठस भरे स्‍वराज भवन के सभागार में प्रो धनंजय वर्मा , डा देवेन्‍द्र दीपक , हरि जोशी, विजयबहादुरसिंह , रमेश दवे, हरिभटनागर, डा मोतिसिंह, विजय कुमार देव,मुकेश वर्मा तथा डा शंकर सोनाने आदि कई साहित्‍यकार उपस्थित थे।                            

                                    —-शंकर सोनाने

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Published in: on जनवरी 28, 2008 at 3:17 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे