वफा सिद्धीकी

शायर श्री वफा सिद्धीकी — सलीम कुरैशी                             

 

नाम उबैदुर रहमान      तखल्‍लुस  वफा सिद्धीकी

पिता का नाम   स्‍व मौलवी अबुबकर

जन्‍म  20 जनवरी 1836

शिक्षा  इन्‍टरेन्‍स ,अदीब कामिल,मुंशी फाजिल,आनर्न्‍स इन उर्दू

पेशा   स्‍टील फेब्रीकेशन इण्‍डस्‍टीज

पता 6,सदाबरत लेन,बेलदारपुरा,भोपाल मप्र

फोन   0755 2738589

 

    श्री वफा सिद्धीकी को शायरी का शौक छात्र जीवन से ही रहा है परन्‍तु बाकायदा शुरूआत सन 1955 से हुई । उनका पहला शेरी मजमुआ “तारे पैहरन” के नाम से सन 1962 में प्रकाशित हुआ । जिसे अदबी व शेरी हलकों में काफी शोहरत और मकबुलियत हासिन हुई । श्री वफा सिद्धीकी मूलत:  गजल के शायर है परन्‍तु उर्दू शायरी की भी सिन्‍फों में महारत रखते हैं । श्री वफा सिद्धीकी को अपने विशेष अन्‍दाज बयान से मुशायरो में मकबूलियत मिली । देश के बड़ बडे़ शहरों में आयोजित होनेवाले मुशायरों में बुलाये जाते हैं । आपको पाकिस्‍तान के मुशायरों में भी आमंत्रित किया गया और उन्‍हें काफी प्रसिद्धी मकबूनियत हासिल हुई । आपको रेडियो  टीवी के साहितियक्‍ कार्यक्रमों मे भी आमंत्रित किया जाता है ।

   अभी तक आपके तीन शेरी मजमुएं प्रकाशित हो चुके हैं, जो इस प्रकार है :—

1;  तारे पैहरन  (गजलें व नज्‍में 1962),

2-  नक्‍शे वफा (गजलों का संग्रह 1995)

3 सारे जहां से अच्‍छा (हिन्‍दी और उर्दू में कौमी नज्‍में,ये रेडियो और टीवी कार्यक्रमो में प्रसारित)

 

  श्री वफा सिद्धीकी के कुछ मशहूर शेर जो लोगों को याद है और मिसाल के तौर पर पेश किये जाते हैं ।

 

                     आए गमें दौरा तुझे सिने से लगा लें ।

                     बरसों गमें जाना  मेरे महमान रहे हैं ।।

                     दुश्‍वार से दुश्‍वार हो वो काम हमें दो ।

                     सुलझायेंगे हम गेसु ए अययाम हमें दो ।।

                     तुमसे तो गुरेजां  नजर आते हैं ये मयकश ।

                     हम सबको पिलायेंगे जरा जाम हमे दो ।।

                     हजार तारिकियों के पहरे कदम कदम पर लगे हैं लेकिन।

                     रवां दवां मंजिलों की जानिब सहर के राही निकल रहे हैं ।।

                     मेरे मरल्‍फूजात लिखें हैं जिन्‍दा की दीवारों पर ।

                     मकतल में जो गूँज रही है वो मेरी तकरीरें है।।

                     सवानेजे पर सूरज आ गया है।

                     मगर दिन है के अब तक सो रहा है ।।

 

              सूरज से रकाबत का उसे खब्‍त हुआ है ।

              वो जिनको दीये की तरह जलना नहीं आता ।।

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Published in: on मई 26, 2008 at 5:29 अपराह्न  टिप्पणी करे  

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