picture-001उभरती हुई शायरा : नुसरत मेंहदी

 सलीम कुरैशी

 उर्दू साहित्य जगत की जानीमानी प्रसिद्ध शायरा नुसरत मेंहदी का जन्म 01 मार्च 1965 को नगीना जिला बिजरौर (उत्तर प्रदेश) में हुआ । उन्होंने अंग्रेजी में एम.ए. और बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी से बी.एड किया । शायरी के साथ-साथ उनके मज़ामीन कहानियाँ नाटक आदि भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। शासकीय सेवा में रहते हुए भी अदब व शायरी की दिलोजान से सेवा कर रही है। जहाँ तक आकाशवाणी और दूरदर्शन का संबंध है वह उनको अपने कार्यक्रमों में अक्सर बुलाते हैं उनकी रचनाएं प्रसारित होती है। उन्हें अब देश से बाहर भी कार्यक्रमों के निमंत्रण मिल रहे हैं। पिछले दिनों जद्दा ( अरब देश ) और रियाज़ ( अरब देश ) में भी अपनी कामयाबी के झण्डे बुलन्द कर भारत का नाम रोशन किया । जहाँ तक मुशायरों का तआल्लुक है हिन्दुस्तान में जितने भी बड़े मुशायरे होते हैं मोहतरमा नुसरत मेंहदी को ज़रूर बुलाया जाता है और वह बड़ी नफासत के साथ मुशायरो में तशरीफ लाती है। मोहतरमा नुसरत मेंहदी की यह भी विशेषता है कि वह हिन्दी उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओ में लिखती है और तीनों भाषाओं का अच्छा ज्ञान भी रखती है। वर्तमान में मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के सचिव के पद पर कार्यरत है। शायरी उनको पैतृक तौर पर वरसे में मिली है। उनकी दो बहनें शमीम ज़ोहरा और डॉ.मीना नकवी भी अच्छा शायरा है । नुसरत मेंहदी के पति भी एक अच्छे लेखक है । इसी के साथ-साथ इनके परिवार में अनेक लोग साहित्य जगत से जुड़े हुए है और साहित्य जगत की खिदमत में पूरा परिवार ही एक तरह से संलग्न है। नुसरत मेंहदी ने 1981 में पहली कहानी लिखी  मैं क्या हूँ  जिसका प्रसारण आकाशवाणी नज़ीराबाद से उसी वर्ष हुआ । शायरी की शुरूआत सन् 1982 से हुई उनकी पहली ग़ज़ल का मतला है – सन्नाटों के सीने से तूफ़ान उठा देंगे हम ऐसे समन्दर है जो आग लगा देंगे कई सेमीनारों में भाग लेकर मुल्क के अदबी फनकारों के फ़न और शिख्सयत पर मक़ाले पढ़े उनकी राही शहाबी अख्तर सईद खाँ इशरत क़ादरी नईम कौसर वसीम बरेलवी ज़फर नसीमी आदि शामिल है। इसी के साथ मन्ज़ूम ख़राजे तहसीन भी आपने पेश किये हैं उनमें अल्लामा इक़बाल ममनून हसन खाँ इक़बासल मजीद आदि शामिल है। शीघ्र ही उनकी उर्दू शायरी की पुस्तक & साया साया धूप & प्रकाशित हो रही है । कुछ शेर पेश है:- तारीकियों में सारे मनाज़िर चले गये जुगनू स्याह रात में सच बोलता रहा — –

– आबे हयात पी के कई लोग मर गये

हम ज़हर पी के जिन्दा है सुक़रात की तरह

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किसी एहसास में डूबी हुई शब

सुलगता भीगता आँगन हुई है

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इससे पहले कि दास्ताँ हो जाऊँ

अपने ल़ज़ों में खुद बयाँ हो जाऊँ

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तोल कर देख लें अज़मत की तराज़ू में

इसे मेरी चादर तेरी दस्तार से भारी होगी

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 अपनी बेचारगी को देख कर रोज़

 एक आईना न तोड़ा कर

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सलीबो दार से उतरी तो जिस्मों जाँ से मिली

मैं एक लम्हें में सदियों की दास्ताँ से मिली – – हर कोई देखता है हैरत से तुमने सबको बता दिया है क्या

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नुसरत मेंहदी के बारे में वरिष्ठ साहित्यकारों के विचार:-

 “ नुसरत मेंहदी शेरगोई की बारीकी से वाकिफ़ है । वह जानती है कि दो मिसरों का रास्ता कितना नज़ाकत और बारीकी का काम है । उन्होंने मुतअदिद अशआर के ज़रिये उर्दू ग़ज़लगोई में एक नए लहजे का इज़ाफा किया है।

                     –श्री मुमताज राशिद

“नुसरत दयारे सुखन में नव-वारिद है । मगर उनकी शायरी ये तहस्सुर ज़रूर देती है कि उनका शायराना वुजदान ग़ज़ल आशना है…….नुसरत मेंहदी की ग़ज़ल पढ़ते हुए खूबी भी नज़र आती है कि उन्होंने फैशनवाली निसाइयत पसन्दी को अपनी ग़ज़ल में राह नहीं दी ।

                         — जुबेर रिज़वी

“ मैं मोहतरमा नुसरत मेंहदी साहिबा को ऐसी शायराओं में शुमार करता हूँ जो शोहरत की हासिल करने का लालच किये बग़ैर अदब की इबादत कर रही है। —                   डॉ.कैलाश गुरूस्वामी

आखिर में यही कहा जा सकता है कि नुसरत मेंहदी उर्दू शायरात में न सिर्फ मुशायरों की हद तक कामयाब है बल्कि उर्दू अदब में भी अपना नुमाया बनाती जा रही है और उनका शुमार मुल्क की उभरती हुई शायरात में है। — सलीम कुरैशी 233- बी हाउसिंग बोर्ड कालोनी, करोद, भोपाल मोबा. 9425637960

Published in: on अप्रैल 8, 2009 at 9:34 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे